Thursday, February 18, 2010

संपादकीयजनहितैषी निर्णयकेन्द्र सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि आम नागरिक की किसी भी प्रकार की शिकायत को एक आई आर की मान्यता दी जाए। गृह मन्त्रालय राज्य सरकारों के माध्यम से थानों में पंजीकृत होने वाली शिकायतों पर कार्यवाही के सम्बंध में स्पष्ट दिशा-निदेüश देगी कि जनता की शिकायत तकलीफ को गम्भीरता से लिया जाकर उसका निदान किया जाए।केन्द्र सरकार की यह भावना सराहनीय एवं जनहितौषी है। होना भी यही चाहिए कि अत्याचारी दण्डित हो अत्याचार पर अंकुश लगे समाज में सुख-शान्ति का वातावरण निर्मित है। एक-दूसरे में अपनत्व भाईचारा बड़े आदि ईमानदार समाज के लिए इस प्रकार के उपक्रम सार्थक सिद्ध होंगे मगर बेईमान धूर्त समाज इस शा का दुरुपयोग करना शुरू कर दे जो केन्द्र सरकार हर शिकायत को एफ.आई.आर. की मान्यता दे। परन्तु उसके साथ ही यह प्रावधान भी रखे कि अत्याचारी एवं बेईमान धनवली बाहुबली उसका दुरुपयोग कर सच्चे और ईमानदार व्यçक्त पर दुरुपयोग न कर पाए। अगर हम इतिहास में जाकर देखे तब हमारे यहां का पुलिस संगठन की संरचना ब्रिटिश कालीन है। उसके काम करने का ढंग भी ब्रिटिश कालीन अवधारणा पर आधारित है। मसलन कि शिकायत कर्ता को यह सिद्ध करना होगा कि उसकी शिकायत रही है उस पर अत्याचार किया जा रहा है। जबकि व्यवहार में देखा जाए अत्याचारी अपने आपको सीधा-सा बचा ले जाता है या फिर अत्याचारी भी क्रास केस तैयार कर अपने को सुरक्षित कर लेता है।पुलिस विभाग की वृçत्त प्रवृçत्त एवं काम करने का ढंग से सम्भवतज् केन्द्र सरकार सुपरिचित हो। वर्तमान कार्य पद्धति के अनुसार एफ.आई.आर. दर्ज कर लेने का अभिप्रायज् पुलिस विभाग के कुछ कारिन्दों की आमदनी में बढ़ोतरी करना है जो राजकोष में न पहुंचकर निजी कोष में पहुंचती है। आज पुलिस विभाग की कार्यपद्धति स्थिति से हम सभी अच्छी तरह वाकिफ है। वर्तमान परिस्थितियों में किसी प्रकार की कोई सकारात्मक कार्यवाही हो सकती ऐसी संभावना कम है। संभावना तो यह अधिक है कि उल्टी इस व्यवस्था से आम जनता का और अधिक शोषण होने लगेगा।आज स्वतन्त्र हुए 62 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं पर हम लोकतन्त्र के आधारभूत बिन्दुओं को भी अमल नहीं कर पाए। बात तो हम लोकतन्त्र की करते हैं पर व्यवहार में हम सभी सामन्तवादी अवधारणों के उपासक हैं। हमारे प्रत्येक कदम अधिनायकवादी एवं सामन्तवाद की पृष्ठ भूमि पर खड़ा है। लोकतन्त्र का अभिप्रायज् जनता की सरकार जनता के लिए होना है परन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं है। जन प्रतिनिधिय स्वयं को सेवक के तौर पर प्रस्तुत करके चुनाववाद अस्थायी मालिकाना तक प्राप्त कर लेते हैं। यही स्थिति प्रशासनिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों की है वह तो स्वयं को स्थायी मालिक मानकर चलते हैं।कुल मिलाकर केन्द्र सरकार का राज्य सरकार पुलिस की कार्यपद्धति एवं उनके क्रिया-कलापों की बारीकियों को अच्छी तरह जानती है ऐसे में किसी भी शिकायत को एक एफ.आर.आर. की मान्यता मिल जाने से जनता की तकलीफ बढ़ न जाए इस पर यह बात की सरकार को सुनिश्चित करनी होगी।

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