Wednesday, October 7, 2009

सरकारी खजाने पर किसका हक ?

मध्यप्रदेश सरकार का लक्ष्य लुभावना, सुहाना, आनंदित करने वाला है। पढने और सुनने में मुख्यमंत्री की जनता और कर्मचारियों के प्रति सहानुभूति पूर्ण सोच हृदय को आह्लादित करने वाली है। वैसे भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की भाषा में आकर्षण और अपनत्व अधिक मात्रामें समाहित रहता है। उनकी मुस्कराहट प्रथम दृष्टया ही सामने वाले पर अलग छाप छोड़ती है। शिवराज सिंह कर्मठ एवं अपनों के प्रति अधिक सहानभूति पूर्ण व्यवहार रखने के लिए ख्यातिमान शक्शियत के र्प्पो में पहचान बना चुके हैं यह गुण उनहोंने उधार में लिया होगा क्योंकि भारतीय जनता पार्टी एवं संघ में सुबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व टालने, मीठी मीठी बातों को परोस कर अपनों का शोषण करने का रहा है। शिवराज सिंह इसके लिए अपवाद हैं, हों भी क्यों ना, सत्ता में अपनी पकड़ बनाये रखने के लिए आवश्यक है अपनों को साध कर रखना, नहीं तो कोई विभीषण आकर सत्ता ही हथिया लेगा।
इसी संदभ में एक और सटीक कहावत प्रचिलित है की दाई से पेट नहीं छिपता। कर्मचारी वर्ग को सरकार के पेट के बारे में अच्छी तरह जानकारियाँ हैं इसलिए कहा गया है के आदमी जब झुकता है तुब खुटनों की तरफ़ ही उसका झुकाव होता है। मसलन सरकार का झुकाव अपने कर्मचारियों के प्रति ही रहेगा। यही एक मात्र कारण रहा है की आज कर्मचारी को भाजपा सरकार ने अपने कार्यकाल में इंतना कुछ दिया है जितना कांग्रेस ना दे सकी। भाजपा सरकार को विरासत में कर्मचारियों से जुड़े ढेर सारे उलझे मुद्दे और प्रदेश में कर्मी संस्कृति विकसित करने का अजीबोगरीब ढांचा ही मिला है। भाजपा सरकार कर्मी संस्कृति से पूरी तरह असहमत थी क्योंकि उसका मानना है की सभी को समान भाव से कार्य करने और सुविधायें हासिल करने का अधिकार है। शिक्षा कर्मियों को अध्यापक संवर्ग में सम्मिलित करते हुए जरूरी सुविधाएँ दिए जाने की दिशा में सकारात्मक पहल की गई है। विश्वविद्यालयों के शिक्षकों के हितों को लेकर भी सरकार का रुख सजग और मददगार रहा है। इन सुब बातों से यह स्पष्ट है की सरकार का झुकाव सरकारी कर्मचारियों के प्रति है। इसी संदभ में विचारणीय प्रश्न यह है के सरकारी खजाने पर सुबसे ज्यादा हक किसका है। मुख्यमत्री जो मीठी मीठी चुपडी हुई चाशनी से सराबोर