Thursday, February 18, 2010
22 दिसम्बर, मंगलवार,09संपादकीय-1समझना होगा कार्यकर्ता का ददüभारतीय जनता पार्टी के इतिहास में 18-19 दिसम्बर 200भ् का दिन महत्वपूर्ण दिन होगा, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी ने भी कांग्रेस पार्टी की तरह संसदीय दल के अध्य7 का पद निर्मित कर लिया है और लोकसभा में विपक्ष के नेता से त्यागपत्र देने वाले लालकृष्ण को उस पर सुशोभित कर सम्भवतज् तुष्टीकरण की नीति अपनाई है।इस व्यवस्था से सांसद आडवाणी के कद में इजाफा हुआ है या पिर गिरावट आई है यह अलग बात है, परन्तु भारतीय जनता पार्टी के संविधान में संशोधन कर बनाए गए नये पद पर विराजे व्यçक्त कोसंसद एवं राज्यसभा के दल नेता नियुक्त करने तक का अधिकार मिलता निश्चित रूपसे बढ़े हुएकद को दर्शाता है।नये संसदीय दल के अध्यक्ष पद का निर्माण संघ की विचारधारा से मेल खाता है या नहीं यह अलग बात है पर इतना तो निश्चित ही कहा जा सकता है कि इस व्यवस्था से भारतीय जनता पार्टी का समग्र आन्तरिक सुधार सम्भव नहीं है।भाजपा भयावह संकटों और अन्तर्कलह से घिरी पार्टी में यदि नेतृत्व अपने को प्रमुखता दे तब कैसे माने कि भारतीय जनता पार्टी के अखिल भारतीय नये अध्यक्ष नितिन गडकरी ऐसा कुछ कर पाएंगे जो भारतीय राजनीति को नई दिशा देखने में कामयाब हो सके। संगठन का कायाकल्प समर्पण से होता है। भाजपा तो संस्कारित पार्टी हैं। मां,पिता, गुरु, पति-पत्नी, लड़का-लड़की आदि के समर्पण ही परिवार की एकता की शçक्त को अनुभव कराते हैं। पिछले लगभग भ् माह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के मन्थन के जो परिणाम सामने आ रहे हैं वह भारतीय जनता पार्टी के वास्तविक संकटों का निदान नहीं कर पाएंगे। जब तक भाजपा नये सिरे से आम जनता में यह सन्देश नहीं बिखेरती कि भारतीय जनता पार्ट नेताओं की पार्टी नहीं है आम जनता के दुख ददü को मुखरित करके निदान करने वाली पार्टी है। नितिन गडडकरी पहले दिन से ही आम आदमी में पार्टी के प्रति विश्वास त्याग और समर्पण का जनजागरण कर पार्टी के प्रति विश्वास त्याग और समर्पण का जन जागरण कर पार्टी को पूर्ववत खड़ा करने को प्राथमिकता दे न कि पुराने लोगों से आशीर्वाद लेने में लगे रहे।भारतीय जनता पार्टी के नये अ.भा. अध्यक्ष गडकरी की आस्था आम कार्यकर्ता और पार्टी की नीतियों में होनी चाहिए न कि नेताओं की तुष्टीकरण में। राज्यसभा लोकसभा पर गडडकरी का कितना प्रभाव रहेगा। ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब आम कार्यकर्ता जानना चाहता है कोई भी व्यçक्त हो पार्टी से बड़ा नहीं हो सकता। जहां नेता बड़ा होने की बात सोचता है वहीं पर पार्टी का मार्ग गर्त की ओर मुड़ने लग जाता है। इस पर विचार किया जाना चाहिए। गडकरी की सोच में पुराने समर्पित लोगों को साथ रखने का जो विचार आया है वह सकारात्मक है।
संपादकीय-2महंगाई ने उलझन बढ़ाईशीतकालीन अधिवेशन में संप्रग के निति निर्धारक नेता अपनी रणनीति में सफल ही नहीं रहे बल्कि भारतीय जनता के सामने विपक्ष की नकारता को ढोल धमाके के साथ उजागर कर दिया। सांसद तो मात्र सुविधाओं को भूखे हैं जनता की परेशानियां उन तक पहुंच ही नहीं पाती। विपक्ष को महंगाई का मुद्दा सबसे उपयुक्त लगता है। इस पर बहस भी होती है पर निर्णय कुछ भी हाथ नहीं आता। सरकार की निçष्क्रयता के कारण आवश्यक वस्तुओं के भाव अक्टूबर के मुकाबले तीन गुना बढ़ गये हैं। वित्तमन्त्री महंगाई बढ़ने से चिन्ता व्यक्त करने की रस्म अदायगी कर रहे हैं। खाद्य पदाथोZ की महंगाई दर नवबर के अन्तिम सप्ताह में 19.04 प्रतिशत भी पिछले 8 माह में आलू 141 प्रतिशत चीनी 37 प्रतिशत दालें, 32 प्रतिशत प्याज, 20 प्रतिशत बढ़े हैं। प्रधानमत्री की आर्थिक सलाह परिषद के अध्यक्ष सुरेश तेन्दुलकर ने कहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक महंगाई पर काबू पाने के लिए नकदी खींच सकता है तथा अगले महीने क्रेडिट पॉलिसी पुनरीक्षित की जा सकती है। थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर नवबर में सबसे ज्यादा 7.78 फीसदी हो गई। पिछले साल इसी महीने में 1.34 प्रतिशत थी। वित्तमन्त्री प्रणब मुखर्जी और वाणिज्यमन्त्री आनन्द शर्मा भी महंगाई बढ़ोत्तरी से चिन्तित हैं। अर्थशाी इन्द्रनील पान का कहना है कि खाद्य और कामोडिटी के दाम बढ़ने का सीदा असर जनता पर पड़ रहा है उनका कहना है कि अगले वर्ष मार्च तक थोक मूल्य सूंचकांक आधारित महंगाई पर 8-7 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। केन्द्रीय बैंकको सिस्टम में मौजूदा ज्यादा नकदी को कम करने के लिए कदम उठाने होंगे। रिजर्व बैंक जनवरी में कैश रिजर्व राशियों में 2भ्-भ्0 बेसिस पाइंट की कमी कर महंगाई के खिलाफ कदम उठा सकता है। इस समय खाद्य पदाथोZ की महंगाई आसमान छू रही है। थोक मूल्य सूचकांक में इसका वेटेज 14.4 प्रतिशत है। कुल मिलाकर केन्द्र सरकार महंगाई को नियन्त्रित करने में स्वयं को असक्षम मान रही है। वह राज्यों से अपेक्षा कर रही है कि वह कारगर कार्यवाही करें।
आधारभूत ट्रेक अब पहली बार पकड़ में आता दिखलाई दे रहा है। प्रश्न उठता है कि 1भ् अगस्त 1947 को देश को स्वतन्त्र करवाते समय आम जनता के मन में जो सपना जगाया गया था। उसको कार्यरूप में परिणित करने का आंशिक प्रयास गुजरात की सत्तारूढ़ पार्टी ने प्रारंभ किया है। देश के इतिहास में यह प्रथम अवसर है जब गुजरात विधानसभा ने मताधिकार को अनिवार्यता के दायरे में लाने का विचार बनाया फिलहाल वह राज्य के स्थानीय निकायों को गुजरात स्थानीय प्राधिकार (संशोधन) विधेयक 200भ् राज्य विधान सभा में प्रस्तुत किया जाएगा।अगर यह विधेयक पारित हो जाता है तब निश्चित तौर पर भारतीय लोकतन्त्र में सकारात्मक सुधार दिकाई देने लगेगा और लोकतन्त्र की आदारभूत कल्पना साकार होती दिखाई देने लगेगी। लोकतन्त्र का आधार ही लोकमत के अनुसार देश का संचालन करना है। कुल मिलाकर लोकतन्त्र की भावना के अनुरूप अब भारतीय जनता पार्टी की गुजरात सरकार ने देशवासियों का ध्यान आकर्षित है कि लोकतन्त्र के लिए कौन पार्टी बेईमान स्वार्थी है और कौन-सा राजनैतिक दल ईमानदार सोच रखता है। आज स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं में मताधिकार को आवश्यक किये जाने का विधेयक लाया जाएगा तो कल विधानसभा और लोकसभा में भी ऐसा विधेयक लाना ही पड़ेगा जब देश में सभी जगह मताधिकार आवश्यक हो जाएगा उस दिन देश में वास्तविक लोकतन्त्र का राज शुरू होगा।
असम की संप्रभुता के मुद्दे पर 1979 में उल्फा का गठन जनता के हितों की रक्षा के मद्देनज़र किया गया था। इस संगठन को असम की जनता का भारी समर्थन हासिल था क्योंकि भेदभाव का शिकार असम के गांवों में रहने वाले इस संगठन की शçक्त थे मगर जैसा आम तरीका होता है कि जिस उद्देश्य को लेकर कोई संगठन खग होता है वह कुछ समय बाद स्वाथोZ एवं अहमवादिता से ग्रसित हो जाता है और वह अपने लक्ष्य से भटककर हिंसाके रास्ते पर चलना शुरू कर देता है बस वहीं से जनता के हितों की जगह आतंकवादी अलगाववादियों की गिरत में पहुंच जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ जिसकी बजट से यूनाइटेड लिबरेशन फंट आफ असम (उल्फा) असम की ग्रामीण जनता का ही अहितैषी होकर आईएसआई आदि उग्रवादियों की गोद में जा बैठा, और हिंसा का रास्ता अतयार कर असम में आतंकवाद बम धमाके, निदोüषों की हत्यायें करने लगे हैं।यह सच है कि बन्दला देश बनने के बाद वहां पर राजनीतिक अस्थिरता का वातावरण बना और कट्टरपन्थियों के हाथों में खेलकर उल्फाजैसे भारतीय आतंकवादीसंगठनों की पनाहगाह जगह बन गया। इतना ही नहीं कश्मीर घाटी के माध्यम भारत में आतंकी पैदा करने के लिए पाक की आईएसआई को समान सोच वाले संगठनों से बातचीत कर एक वृहद इस्लामी राष्ट्र बनाने के लिए असम में पूर्ण अस्थिरता पैदा करने का षडयन्त्र रचा गया और बंगलादेश से भारी मात्रा में घुसपैठ करवाई गई। हमारे देश के सत्तारूढ़ दलों ने सस्ती लोकप्रियता और चुनावी लाभ के लिए बंगलादेशी घुसपैठ के मूकदर्शक बने रहे। उल्फा वृहद इस्लामी राष्ट्र बनाने के इरादे से असम पर हमला कर उसे बन्दलादेश से मिलानेकी ताक में बैठी ताकतों के हाथों बिक गया। उल्फा के नेतागण बंगलादेश से अपने संगठन का संचालन करने लगे इन्हें आईएसआई और हूजी जैसे संगठनों से सहायता, प्रशिक्षण और हथियार बारूद आदि की सहायता आसानी से उपलब्द होने लगी।पिछले तीन दशक से जारी यह खेल आखिर कब तक खेला जाता रहेगा इसका अन्त होने का समय आ गया है। इस पार या उस पार। भारत सरकार इसी मामले में 1992 में एक बार धोखा खा चुकी है। अब की बार सरकार को बहुत सोच समझकर फूंक-फूंक कर कदम उठाने पड़ेंगे। गृहमन्त्रालय शान्ति वार्ता शुरू करने के पहले सुनिश्चित कर ले कि उल्फा प्रमुख अरविन्द राजखोवा को सार्वजनिक तौर पर संप्रभुता की मांग को छोड़ने की घोषणा करनी ही चाहिए।प्रतिबंधित संगठन यूनाइटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के संस्थापक एवं अध्यक्ष अरविन्द राजखोवा, उसके निजी सुरक्षाकर्मी राजा बोरा और उप प्रमुख राजू बरुआ को अदालत में पेश किया गया। राजघोवा ने फिलहाल कहा है कि उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया उन्हें गिरतार किया गया है। दूसरी तरफ उल्फा के कमाण्डर इन चीफ परेश बरुआ राजखोवा की गिरतारी की खबर का खण्डन किया है। कुल मिलाकर सरकार को बदलते हुए घटनाक्रम पर पैनी नज़र रखने की जरूरत है साथ अभी 12 दिनों तक न्यायिक हिरासत के समय ऊंट किस करवट बैठता है। इस पर विचार किये जाने की जरूरत है। असम सरकार इस दौरान आतंकवादियों पर अपना पूरा कसाव रखकर सत कार्यवाही का दबाव बनाकर मुयधारा से जोड़ने का माहौल बनाए।
