Thursday, February 18, 2010
संपादकीययह कैसा अर्थशा?अर्थशा गूढ़ विषय है पर व्यçक्त के लिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। इस की चाल भी अजब है उसे आम तरीके से समझा नहीं जा सकता है मन्दी व्यापार में स्थिरता उत्पाद के मूल्य में गिरावट परिलक्षित करती है फिर भी महंगाई के कारण रोजमर्रा के उत्पाद के भाव क्यों बढ़ जाते हैं यह एक स्वाभाविक प्रश्न है जिस पर भारतीय जनता अपना सिर धुनती यदाकदा दिखलाई देने लग जाती है। वास्तव में जब विकास दर में बढ़ोतरी होगी उसस्थिति महंगाई बढ़ती है।आज हमारे देश में महंगाई चरम पर है। लोकसभा के चुनाव के बाद दैनिक उपयोगी वस्तुओं के दामों में बेइन्तिहा बढ़ोत्तरी हुई है। इस सम्बंध में अर्थशा की चाल कुछ भी हो पर राजनीतिशा तो यह कह रहा है कि महंगाई की मार से हर आम आदमी त्रस्त है।एक और महत्वपूर्ण प्रश्न लोकसभा और विधानसभा चुनावों के परिणाम देखने के पश्चात उभर कर सामने आ रहा है कि वास्तव में आदमी की क्रय शçक्त इतनी नहीं है कि वह सामान्य तरीके से अपना जीवन यापन कर सके वह विषमता में न तो मरने को है और न ही जीने के लिए। पर कांग्रेस को हर तरफ से जनता का समर्थन प्राप्त हो रहा है। विपक्ष कितना भी जोर लगाले यह सत्तापक्ष का बालबांका भी नहीं कर पा रहे हैं। हाहाकार है निदान नदारत है। खाद्यान्न की प्राçप्त है स्थितियां अनुकूल है फिर भी महंगाई बढ़ रही है, यह अर्थशा की शतरंजी चाल की करामात है या फिर राजनेताओं और व्यापारियों का चुनावी अर्थशा का परिणाम है। ऐसी परिस्थिति नहीं दिखलाई दे रही है जिसकी वजह महंगाई बढ़ रही हो और वर्तमान महंगाई की बढ़ोत्तरी को रोका नहीं जा सके। निश्चिततौर से व्यवस्था में उदासीनता भ्रष्टाचार जमाखोरी एवं राजनेताओं और व्यापारियों का गुप्त समझौता मूल कारणों की तरफ इशारा कर रहे हैं। महंगाई को रोकने जमाखोरों व वायदा बाजार पर कसाव करने के बजाय केन्द्रीय कृषिमन्त्री एवं प्रधानमन्त्री महंगाई बढ़ने को समर्थन देकर जमाखोरों और व्यापारियों को मदद में बयान दे रहे हैं। यह अर्थशा के कौन से उपखण्ड का शोध प्रबंध है या शोध विषय है कि अर्थशाी डा. मनमोहन सिंह जो देश के प्रधानमन्त्री की कुर्सी पर विराजमान हैं। वह महंगाई बढ़ोत्तरी के पक्ष में देशवासियों को कह रहे हैं। हम मानते हैं और समझते भी हैं कि संसद में एक भी ऐसा कर्मवीर कत्तüव्यनिष्ठ गरीबों की अनुभूति को अनुभव करने वाला व्यçक्त नहीं है जो महंगाई बढ़ने की घटना पर कुबाüनी के लिए तैयार होकर सरकार से दो-दो हाथ करने का साहस रखता हो एक भी सपूत सांसद नहीं है जो देश की आधारभूत मूल आवश्यकताओं की प्राçप्त को संवैधानिक अधिकार दिलवाये जाने के लिए अड़ जाता है। राजनीति का मतलब यह नहीं कि हम अपनी जिमेदारियों को वॉलीबाल बनाकर केन्द्र से राज् की तरफ उचकाते रहकर अपने-अपने स्वाथोZ की पूर्ति करते रहे।आर्थिक सुधारों की समर्थक केन्द्रीय सरकार महंगाई पर काबू नहीं पाने में विफलता का अर्थ यही है। अगर हम यह कहें कि महंगाई पर कोई भी जनप्रतिनिधि गम्भीर नहीं है तब अतिश्योçक्त नहीं होगी। हमारे यहां का तन्त्र इस कदर भ्रष्ट हो चुका है जिसकी कल्पना भी कभी नहीं की गई होगी। जन प्रतिनिधि कोई भी किसी भी पार्टी का या निदüलीय हो चुनाव में खड़ा ही नहीं हो सकता। हमारे यहां के जनप्रतिनिधि आम जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं होते वे उन लोगों के प्रति समर्पित और वफादार होते हैं जो उन्हें इस कुर्सी तक पहुंचाने में मदद करते हैं।आपको याद दिलाना अपना कत्तüव्य समझता हूं कि संसद महंगाई पर चर्चा के समय संसद कक्ष में लगभग 6भ् सांसद उपस्थित थे। जिस देश में सांसदों की यह स्थिति होगी। वहां समस्या का क्या कब और क्यों निदान होगा।केन्द्रीय सरकार राज्य सरकारों से महंगाई रोकने के लिए कहने लगे हैं और जमाखोरी के खिलाफ कार्यवाही को अंजाम देने की सलाह भेज रहे हैं। राज्य सरकारें कड़़े कदम उठाने से अपने को बचा रही है। दोनों ही संस्थाएं अपना-अपना वोट बैंक क्यों खराब करे। मसलन दोनों ही एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ रहे हैं। खाद्य पदाथोZ के थोक मूल्यों पर आधारित मुद्रास्फीति की दर 1भ्.भ्8 प्रतिशत तक पहुंच गई है। खाद्यान्न के भाव दो गुणे हो चुके हैं। खाद्यान्न आदि की उपलब्धता आसान नहीं है। जन वितरण प्रणाली दोष युक्त है। सुधार जनोपयोगी कार्यक्रम चुनाव के चौथे वर्ष से शुरू होते हैं तब तक जनता का शोषण करने का राजनीतिज्ञों का चिरपरिचित कार्यक्रम अबाध गति से चलता रहता है। भारतीय राजनीतिज्ञों का अर्थशा समझने के लिए हम भारतीयों को एक नहीं कई जन्म लेने पड़ेंगे। क्योंकि जब एक विद्वान अर्थशा के हाथ में पूरी बागडोर हो और वहर बोले कि महंगाई की मार झेलनी ही पड़ेगी। इसमें कुछ नहीं किया जा सकता है।
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