Thursday, February 18, 2010

डीकेवी14 दिसम्बर, सोमवार, 09संपादकीयक्यों भूल गए कुबाüनीभारत के इतिहास में 13 दिसम्बर 2001 का दिन काले दिनके रूप में जाना जा रहा है। इस दिन आतंकवादियों ने हमारेलोकतन्त्र के मन्दिर पर हमला करके उसकी सुरक्षा पर एक प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया। वह आजभी उसी तरीके से देश की जनता, सरकार, जनप्रतिनिधियों से प्रश्न पूछ रहा हैकि क्यासीख ली तुमने? ाज भी हम उसी स्थिति में बैठे-बैठ केवल बतियाते रहते हैं कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं है।शर्म से सिर नीचे तब हो गया जब 13 दिसम्बर 2009 को 8वीं बरसी पर मात्र 11 सांसद उपस्थित हुए। लगताहै हमारे जनप्रतिनिधियों की संवेदनाएं कुंठित हो चुकी हैं। लोकतन्त्र के मन्दिर पर आतंकी हमले की बरसी पर शहीदों को हम श्रद्धांजलि देने के लिए संसद भवन भी नहीं पहुंच सकते। हम कितने ात्म केन्दि्रत होते चले जारहे हैं। चूंकि 13 दिसम्बर को रविवार था इसलिए अधिकांश सांसद अपने-अपने गृह क्षेत्रों में या पिर दिल्ली में ही उपस्थित रहकर भी देश के लिए बलिदान होने वाले शहीदों को अपने क्षेत्रकी जनता की तरफ से श्रद्धासुमन तक समर्पित करना जरूरी नहीं समझा। इस प्रवृçत्त को क्या संबोधन दिया जाना चाहिए इसे जनता और जन प्रतिनिधि स्वंय तय करे। बेशर्मी की भी एक सीमा होती है। हम उस सभी सांसदों से प्रश्न करना चाहेंगे कि उन्हें इस बात की निश्चित तौर से जानकारी होगी फिर ऐसा किस प्रहन्ति के वशीभूत उन्होंने किया। उस शहीद नानकचन्द्र जिसने अपने जान की बाजी लगाकर आतंकियों को संसद भवन में प्रवेश नहीं करने दिया उसकी शहादत को हमारे सांसदों ने यह सिला दिया। शहीद नानक चनू की पत्नी गंगा देवी तो अपने बच्चों को बड़े गर्व से कहती हैं कि उनके पिता ने संसद की रक्षा करते अपने प्राण न्यौछावर किए तुम उस बात के रक्त के अंश हो जिसने अपनेफर्ज के खातिर बलिदान कर इतिहास में अपना नाम लिखाया। आज वहीं बच्चे सांसदों से प्रश्न करते हैं कि 13 दिसम्बर 2001 के दिन उपस्थित सांसदों का रक्षा कवच बनने वाले उसके पिता को मारने वालों सूत्रधार अफजल गुरु क्यों बचे हुए हैं।एक तरफ गंगादेवी उसके बच्चे, और शहीदों के परिवार वाले अफजल को फांसी का इन्तजार कर रहे हैं दूसरी तरफ अफजल के समर्थक और विरोधियों के मध्य एक लड़ाई लड़ी जा रही है जिसे पारदर्शिता का नाम दिया जा रहा है या हम लोकतान्त्रिक की उस व्यवस्था को पुष्ट कर रहे हैं जो हमको बुजदिल बना रही है।हैग अफजल गुरु नाम से चालू ऑन लाइन याचिका पर अभी तक सैकड़ों लोगों ने फांसी दिए जाने का समर्थन किया है पर 20 अक्टूबर 2006 को अफजल की फांसी की तारीफ निश्चित होने के बाद भी आज दिनांक तक कुछ नहीं हुआ। अफजल की पत्नी तबस्सुम और मां आयशाने राष्ट्रपति के पास एक क्षमादान याचिका दाखिल कर दी। प्रश्न उठता है अफजल की मां सबोधन का नैतिक अधिकार नहीं रखती और न ही अफजल की पत्नी, पत्नी होने का अधिकार रखती है जिसकी वजह से कितनों की मांग का सिन्दूर पुछ गया कितने बालक अनाथ हो गए। कितनों के सिर से साये उठ गये यह याल अफजल की मां और पत्नी को नहीं आता। हमारे यहां तो ऐसे कई उदाहरण है जब ऐसी प्रवृçत्त वालों को माताओं और पत्नी ने त्याग कर दिया।संसद भवन पर हमला करने की साजिश करने वालों को दण्ड न देकर देश क्या सन्देश देना चाहता है इस सम्बंध से पता नहीं है पर यह निश्चित है कि इस प्रकार की घटनाओं कोसोचने वालोंको कठोरतम दण्ड मिलना चाहिए। राष्ट्र सर्वोपरि है राष्ट्र के विरुद्ध आंख उठाकर देखने वालों को सार्वजनिक स्थान पर दण्डित किया जाना हमारी शçक्त संपन्नता सार्वभौमिकता स्वतन्त्रता का मापक हैं।

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