Thursday, February 18, 2010

संपादकीयकिस करवट बैठेगा ऊंटशेख हसीना के बंगला देश में सत्ता में आने के पश्चात भारत-बंगलादेश सम्बंध सामान्य होते चले आ रहे हैं तथा दोनों ही देश एक दूसरे के सजायाता कैदियों के प्रत्यर्पण पर संधि भी करने के नजदीक हैं। इस बात की पुष्टि ऐसे हो रही है कि यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आफ असम (उल्फा) के अद्यक्ष भ्3 वर्षीय अरविन्द राजखोवा उनकी पत्नी व अन्य उग्रवादी और उल्फा उपप्रमुख 43 वर्षीय राज बरुआ आदिकी बंगलादेश में गिरतारी कर मेघालय में भारतीय सीमा सुरक्षाबल का सुपुदü करना भारत-बंगला देश के सम्बंधों में मजबूती की दिशा में एक अहम पड़ाव है। अन्य उल्फा नेताओं की गिरतारी हो रही है। इन सब कारणों का यदि हम विश्लेषण करें। तब निश्चित तौर हम सोच सकते हैं कि अरविन्द राजखोवा शान्ति वार्ता के लिए तैयार है। जबकि परेश बरुआ संप्रभुता के अलावा किसी और मुद्दे पर बातचीत नहीं करना चाहते, बातचीत की मध्यस्थता करने वाली इन्दिरा गोस्वामी का विचार है कि असम में स्थायी शान्ति के लिए उल्फा कमाण्डेन्ट परेश बरुआ को बातचीत की प्रक्रिया में शामिल किया जाए।
असम की संप्रभुता के मुद्दे पर 1979 में उल्फा का गठन जनता के हितों की रक्षा के मद्देनज़र किया गया था। इस संगठन को असम की जनता का भारी समर्थन हासिल था क्योंकि भेदभाव का शिकार असम के गांवों में रहने वाले इस संगठन की शçक्त थे मगर जैसा आम तरीका होता है कि जिस उद्देश्य को लेकर कोई संगठन खग होता है वह कुछ समय बाद स्वाथोZ एवं अहमवादिता से ग्रसित हो जाता है और वह अपने लक्ष्य से भटककर हिंसाके रास्ते पर चलना शुरू कर देता है बस वहीं से जनता के हितों की जगह आतंकवादी अलगाववादियों की गिरत में पहुंच जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ जिसकी बजट से यूनाइटेड लिबरेशन फंट आफ असम (उल्फा) असम की ग्रामीण जनता का ही अहितैषी होकर आईएसआई आदि उग्रवादियों की गोद में जा बैठा, और हिंसा का रास्ता अतयार कर असम में आतंकवाद बम धमाके, निदोüषों की हत्यायें करने लगे हैं।यह सच है कि बन्दला देश बनने के बाद वहां पर राजनीतिक अस्थिरता का वातावरण बना और कट्टरपन्थियों के हाथों में खेलकर उल्फाजैसे भारतीय आतंकवादीसंगठनों की पनाहगाह जगह बन गया। इतना ही नहीं कश्मीर घाटी के माध्यम भारत में आतंकी पैदा करने के लिए पाक की आईएसआई को समान सोच वाले संगठनों से बातचीत कर एक वृहद इस्लामी राष्ट्र बनाने के लिए असम में पूर्ण अस्थिरता पैदा करने का षडयन्त्र रचा गया और बंगलादेश से भारी मात्रा में घुसपैठ करवाई गई। हमारे देश के सत्तारूढ़ दलों ने सस्ती लोकप्रियता और चुनावी लाभ के लिए बंगलादेशी घुसपैठ के मूकदर्शक बने रहे। उल्फा वृहद इस्लामी राष्ट्र बनाने के इरादे से असम पर हमला कर उसे बन्दलादेश से मिलानेकी ताक में बैठी ताकतों के हाथों बिक गया। उल्फा के नेतागण बंगलादेश से अपने संगठन का संचालन करने लगे इन्हें आईएसआई और हूजी जैसे संगठनों से सहायता, प्रशिक्षण और हथियार बारूद आदि की सहायता आसानी से उपलब्द होने लगी।पिछले तीन दशक से जारी यह खेल आखिर कब तक खेला जाता रहेगा इसका अन्त होने का समय आ गया है। इस पार या उस पार। भारत सरकार इसी मामले में 1992 में एक बार धोखा खा चुकी है। अब की बार सरकार को बहुत सोच समझकर फूंक-फूंक कर कदम उठाने पड़ेंगे। गृहमन्त्रालय शान्ति वार्ता शुरू करने के पहले सुनिश्चित कर ले कि उल्फा प्रमुख अरविन्द राजखोवा को सार्वजनिक तौर पर संप्रभुता की मांग को छोड़ने की घोषणा करनी ही चाहिए।प्रतिबंधित संगठन यूनाइटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के संस्थापक एवं अध्यक्ष अरविन्द राजखोवा, उसके निजी सुरक्षाकर्मी राजा बोरा और उप प्रमुख राजू बरुआ को अदालत में पेश किया गया। राजघोवा ने फिलहाल कहा है कि उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया उन्हें गिरतार किया गया है। दूसरी तरफ उल्फा के कमाण्डर इन चीफ परेश बरुआ राजखोवा की गिरतारी की खबर का खण्डन किया है। कुल मिलाकर सरकार को बदलते हुए घटनाक्रम पर पैनी नज़र रखने की जरूरत है साथ अभी 12 दिनों तक न्यायिक हिरासत के समय ऊंट किस करवट बैठता है। इस पर विचार किये जाने की जरूरत है। असम सरकार इस दौरान आतंकवादियों पर अपना पूरा कसाव रखकर सत कार्यवाही का दबाव बनाकर मुयधारा से जोड़ने का माहौल बनाए।

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