Thursday, February 18, 2010

संपादकीयसमर्पण से स्थिरता सम्भवझारखण्ड विधानसभा केचुनाव आदेश परिणाम ने प्रदेश की राजनैतिक अस्थिरता को बनाए रखने का संकेत देकर यह बतलाए जाने का संकेत दिया है कि राजनीतिक दलों के नाम कितने भी रख लो सबके सबके सब एक समान है कोई नागनाथ है तो कोई सांपनाथ है। सबके सब जनता की मेहनत की कमाई का उपभोग कर जनसेवक कहलाते हैं। किसी में कोई अन्तर नहीं दिखलाई देता है। एक भी पार्टी में वास्तविक जनप्रतिनिधि नहीं है अगर किसी पार्टी में जनता के प्रति समर्पित व्यçक्त हो तो तब निश्चित ही उन्हें विधानसभा में भेजा जाता औरयदि नकारात्मक वोट की व्यवस्था होती तब निश्चिततौर पर झारखण्ड की जनता अपने विचारों की अभिव्यçक्त नकारात्मक वोट देकर झारखण्ड विधानसभा के वर्तमान परिणाम त्रिशंकु सरकार बनाने के लिए भी इजाजत नहीं देती है। ईमानदारी वाली बात तो यह है कि चुनाव पूर्व जिन-जिन पाटिüयों ने गठबंधन करके चुनाव लड़ा था। उनमें से एक के भी पास बहुमत नहीं है। ऐसी स्थिति में अगर कोई संगठन या पार्टी समर्थन देता है। तब वह जनता द्वारा दिया गया आदेश का उल्लंघन करने की श्रेणी में आएगा।कांग्रेस और भाजपा दोनों ही राष्ट्रीय पाटिüयां बहुमत से दूर है। पिछले चुनाव को आधार मानकर यदि विचार करें तब कांग्रेस की ताकत बढ़ी है और भाजपा से जनता ने मुंह मोड़ लिया है। दोनों ही राष्ट्रीय पाटियां क्षेत्रीय पाटिüयों को नुकसान नहीं पहुंचा पाई है बल्कि क्षेत्रीय पाटिüयों के भाव बढ़ गए हैं। सौदेबाजी के नए-नए आयाम खुले हैं। बोली भी ऊंची होने की संभावना है।झारखण्ड के प्रथम मुयमन्त्री बाबूलाल मराण्डी की शçक्त बढ़ी है। मराण्डी की नई पार्टी झारखण्ड विकास पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था पर बहुमत में पीछे रह गए।झारखण्ड की बात करते समय झारखण्ड मुक्त मोर्चा के नेता शिबू सोरेन को नकारा नहीं जा सकता अबकी बार वह अच्छी साहूकारी स्थिति में है। झारखण्ड की जनता ने क्षेत्रीय पाटिüयों को पूरा समर्थन देते हुए चेतावनी दी है कि अभी भी वक्त है सुधर जाओ अकेले अपने बूते पर सरकार बनाने के लिए जनता में घुसना पड़ेगा, काम करना पड़ेगा। तभी झारखण्ड के मतदाता तुमको परखने का अवसर देंगे।प्राकृतिक सपदा से भरपूर झारखण्ड राज्य सरकार बनाने के लिए आदिवासी मुयमन्त्री चाहता है चाहे वह मराण्डी हो या शिबू सोरेन हो बिना इनके समर्थन के कुछ ही हासिल नहीं हो सकता। अब प्रश्न यह उठता है कि यूपीए इसको मूर्तरूप कैसे दे। बले ही शिबू सोरेन को कांग्रेस ने बहलाना-फुसलाना शुरू कर दिया है। कांग्रेस का मुयमन्त्री बनवाने के बदले में केन्द्र में मन्त्री पद देने का प्रस्ताव मानने को कह रहे हैं। मगर पता चला है कि यह प्रस्ताव शिबू सोरेन मंजूर नहीं है। कांग्रेसी मैनेजरों की निगाह राज्य के माइन्स मिनरल पर है।अभी तक के प्रयासों में झारखण्ड में सरकार बनाना इतना आसान नहीं है। ऐसे वातावरण में इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि पाटिüयों के कुछ मैनेजर खरीद-फरोत के द्वारा सरकार बनाने में लगे हुए हो। नई सरकार के लिए राज्यपाल की जिमेदारी महत्वपूर्ण है। लगता है कि भारतीय जनता पार्टी ने इस स्थिति का आकलन करलिया है तभी तो यशवन्त सिन्हा ने कहा है कि भाजपा को सरकार नहीं बनानी चाहिए। यशवन्त सिन्हा का वक्तव्य इस बात का संकेत दे रहा है कि चुनाव बाद नया गठबंधन ऐसा बनेगा जिससे सब कुछ अच्छा नहीं होगा। शिबू सोरेन ने चुनाव पूर्व कांग्रेस से समझौता नहीं किया इसलिए आज वह स्वतन्त्र है। वह कांग्रेस भाजपा में से किसी से भी हाथ मिलाकर सत्ता के लड्डू गपक सकते हैं। कांग्रेस के साथ मराण्डी है। मराण्डी और शिबू सोरेन में आदिवासी नेतृत्व की जंग जगजाहिर है। झारखण्ड में स्थिति विकट और गम्भीर है इसलिए राज्यपाल की भूमिका अधिक महत्व रखती है।झारखण्ड में लालू प्रसाद के छह विधायकों का अपना महत्व है। सपूर्ण गठित लगाने, और खरीद फरोत के बाद कहीं निदüलीय मधुकोड़ा का इतिहास दोहरा न जाए। यह स्थिति राज्य के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती है। चुनाव पूर्व गठबंधन पर एक नज़र डाले तब कांग्रेस के साथ बाबूलाल मराण्डी जो हिन्दू आधारित संस्कृतिक स्वभाव के हैं कैसे साथ रह सकते हैं? इसी प्रकार भारतीय जनता पार्टी के साथ जनता दल यू जो मूलरूप से हिन्दूवादी विचारधारा के विरोधी हैं। किसी भी प्रकारसे सत्ता की खातिर सरकार बन भी गई तब उसकी उम्र कितनी होगी यह भी विचारणीय होना चाहिए।कुल मिलाकर मतदाता राजनीतिज्ञों, राजनीतिक पाटिüयों और उनके मैनेजरों के कपड़े उतारकर उन्हें बेनकाब करना चाहती है ताकि राष्ट्रीय पाटिüयों की मनोदशा उनके थोथे वायदे और मतदाता के प्रति समर्पण उजागर हो सके। झारखण्ड की आदिवासी जनता राजनीतिक शोषकों को यह सबक सिखलाना चाहती है कि अभी तक हमारी सपçत्त को लूटकर बड़े आदमी बनते रहे और हमको गरीबी में ढकेलते रहे यह नहीं चल पाएगा। नेताओं समाज और देश के प्रति समर्पण करना सीखो उस स्थिति में ही राजनैतिक स्थिरता सम्भव हो सके।

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