Thursday, February 18, 2010
संपादकीयसबसे सुदृढ़ भारतीय अर्थव्यवस्थासपूर्ण विश्व मन्दी की मार से परेशान है जहां देखो मन्दी के कारण उद्योग धंधों से लेकर नौकरियों का टोटा पड़ता चला जा रहा है। नौजवानों को रोजगार मुहैय्या नहीं हो पा रहे हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों में भारत व चीन की अर्थव्यवस्था थोड़े से झंझावातों को झेलकर पुनज् प्रगति के पथ पर अग्रसर है। आज इस बात को कहने में हमको गर्व हो सकता है कि चीन की आर्थिक स्थिति से भी सुदृढ़ता भारतीय अर्थव्यवस्था में है हम वित्तवर्ष की दूसरी तिमाही में शानदार बढ़त पर खड़े हैं। पिछले वर्ष की ठीक इसी तिमाही के मुकाबले इस बार 7.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। जो अर्थशाçयों के अनुमान से कहीं बेहतर है। हम मान रहे ते कि सूखे से बबाüद हुई खेती की उपज इस बार पिछले साल की तुलना में कहीं कम होगी, मगर इस मोर्चे पर भी स्थिति ज्यादा खराब नहीं है।इलेक्ट्रोनिक क्षेत्र के अलावा कार फि्रज जैसे स्थायी महत्व के उपभोक्ता सामानों में तो यह 23 प्रतिशत की ऐतिहासिक ऊंचाई तक पहुंच गई है। इन आंकड़ों से ज्यादा लब-चौड़े परिणाम न निकालें तब भी उस हताशा से अब हम उबर चुके हैं जो हर तीसरे चौथे दिन दुनिया के किसी भी कोने से उछलकर हमारे शेयर बाजारों का गला पकड़ लेती है। दुबई रीयल एस्टेट कंपनियों का दिवालिया होना, भारतीय बैंकों का 6भ्00 करोड़ रुपया दुबई में लगा हुआ है उस पर भी प्रभाव का पड़ना उससे बैंकों को नुकसान होने की पूरी संभावना दिखाई दे रही है। दुबई की वर्तमान स्थिति इसलिए ऐसी हुई है कि दुबई सरकार ने रीयल एस्टेट पर ही अधिक ध्यान दिया और सरकारी कपनी दुबई वल्र्ड ने विदेशी वित्तीय संस्थानों से अंधाधुन्ध कर्ज लेकर भव्य इमारतें खड़ी कर दीं। होटल शापिंग मॉल बना दिए गए। वैश्विक वित्तीय संकट से दुबई भी अछूता नहीं रहा। खरीददार का टोटा पड़ गया जिससे भारतीय बैंकों और विल्डरों, फिल्म स्टारों ने अपना धन तो वहां लगा दिया अब उनका पैसा फंसने की आशंका से दहशत फैल गई है। ब्लैक मनी तो ब्लैक ही हो जाएगी। दुनियाभर की सरकारें अमेरिका ब्रिटेन और भारत तक के शेयर बाजार और रिजर्व बैंक आफ इण्डिया दुबई से जुड़ी कपनियों के जौखिम का हिसाब लगाने में लगी हुई है। आइसलैण्ड में बैंक डूब जाना, अमेरिका में अरबपति की पोल खुल जाना विश्व अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण खबर हो सकती है। मगर हमारे देश भारत जैसे उभरते बाजार के लिए ऐसी खबरें महत्व नहीं रखती क्योंकि हमारे यहां विकास की गति बहुत अधिक बेहतर है। अगर हम यह कहें कि हमारी अर्थव्यवस्था चीन से कहीं अधिक सुद़ढ़ और सशक्त है तब अतिश्योçक्त नहीं होगी। इसी तारतय में यह बतलाना आवश्यक होगा कि वित्तवर्ष की दूसरी तिमाही में चीन की वृद्धि पर 9.6 प्रतिशत दर्ज की गई थी मगर इसमें बड़ा हिस्सा निर्यात आधारित उद्योग का है, जिनका उत्पादन बढ़ने का कोई मतलब तभी है जब ठहरे हुए बाहरी बाजारों में उनका सामान निकल जाए। चीन की तुलना में विदेशी बाजारों पर भारत की निर्भरता आज भी बहुत कम है। बना हुआ माल वापस आने या गोदामों में पड़े-पड़े सड़ जाने का यहां कोई मामला ही नहीं बनता। यानी बीती तिमाही में चीन की वृद्धि दर भले ही भारत से ज्यादा हो मगर आर्थिक स्थिति के स्वास्थ्य की दृष्टि से भारतीय अर्थव्यवस्था का हाल उससे अच्छा समझा जाएगा।मन्दी से लड़ने के लिए सरकार ने जो करों में छूट और निर्यात सçब्सडी जैसे कदम उठाए थे, क्या उन्हें वापस लेने का समय आ गया है। खाद्य वस्तुओं की महंगाई पहले ही असहनीय है बिक्री के आंकड़ों से उत्साहित होकर अब उद्योगों ने भी अपने सामानों की कीमतें बढ़ानी शुरू कर दी हैं तब मुद्रास्फीति बेकाबू हो सकती है इसके लिए क्या ब्याज करें बढ़ाकर कीमतों पर अंकुश लगाने की शुरुआत कर दी जानी चाहिए? इन दोनों ही सवालों के जवाब भविष्य के गर्भ में समाहित है है। मन्दी से लड़ने का प्रश्न के जवाब अगले बजट तक ना में दिया जा सकता है। मगर ब्याज तरें बढ़ाकर कीमतों पर अंकुश लगाने के सम्बंध में जवाब खोजने के लिए अब और इन्तजार नहीं किया जा सकता अच्छी वृद्धि दर का लाभ आम आदमी तक पहुंचाने के लिए मुद्रास्फीति पर तो कमर कसनी ही होगी।
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