Thursday, February 18, 2010

संपादकीयपर्यावरण व्यçक्तगत दायित्वपर्यावरण समेलन का आयोजन और उसके नतीजों से विश्व के समस्त देश वाकिफ हो चुके होंगे। पर्यावरण समेलन का हेतु ही स्वार्थ पर आदारित हो तब उसके परिणाम भी ईमानदार नहीं निकल सकते। पर्यावरण का बदलाव केवल विकासशील देशों को ही प्रभावित नहीं करेगा उसका प्रभाव तो समूची दुनिया पर पड़ रहा है और पड़ेगा। आज विकसित देशों की यह धारणा कि विकासशील देशों पर दबाव बढ़ाकर समझौते करवा लिए जाएं और स्वयं जिस ढरेü पर चल रहे हैं वैसेही चलते रहें। अब यह सम्भव नहीं है। ठीक है पर्यापरण परिवर्तन की मार हमारे ऊपर भी पड़ रही है। हम भी उसे झेल रहे हैं पर विकसित देशों की स्थिति तो ऐसी है कि वह प्राकृतिक परिवर्तन को झेलने की स्थिति में भी नहीं है पिछले कुछ दिनों से हो रही वर्षवारी ने पाश्चात्य देश संकट में आ गए हैं। प्राकृतिक परिवर्तन ने जन जीवन अस्त व्यस्त कर रखा है। अगर अभी भी विकसित देशों ने अपने रवैये में परिवर्तन नहीं किया तब उनको भी गम्भीर स्थितियों से दो चार होना पड़ेगा। जहां तक सवाल उठता है भारत का उसमें तो सहनशीलता और परिस्थितियों को अनुकूल बनाने की अतिरिक्त क्षमता है। भयंकर मन्दी के समय में भी भारत अडिग अटल खड़ा रहे। प्राकृतिक परिवर्तनों को झेलने में उसे तकलीफ नहीं होगी।साधारण-सी बात है कि पर्यावलरण पर नियन्त्रण का जिमा जनता पर है। आम आदमी को पर्यावरण को सन्तुलन देने के लिए शिक्षित करना पड़ेगा और उसे प्रोत्साहित करना पड़ेगा। कोपेन हेगन में लगभग एक पखवाड़े तक चलने वाले समेलन के परिणाम अप्रत्याशित नहीं कहे जा सकते। यह समेलन विकसित देशों की कूटनीतिक चाल थी कि किस प्रकार विकासशील देशों से अपने हितों के अनुरूप समझौते पर हस्ताक्षर करवा लिए जाएं। विकसित देश हर क्षेत्र में अपनी दादागिरी की अंजाम देना अपना अधिकार मानकर चल रहे हैं पर अब वक्त बदल रहा है। विकासशील और विकसित देशों के मध्य काबüन उत्सर्जन में कटौती का मुद्दा तो समेलन शुरू होते ही असहमति के आगोश में तड़पने लगा था भला हो अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा का उन्होंने विकासशील देशों की भावना को समय रहते पढ़ लिया और थोड़ी समझदारी दिखाई जिसकी वजह से दो बिन्दुओं पर सहमति बन सकी। एक तो पृथ्वी का तापमान 2 डिग्री सेçल्सयस से अधिक नहीं बढ़ने दिया जाए। इसका विकासशील देश विकसित देशों को आर्थिक मदद करते रहेंगे। इस सहमति का आज के दिन कोई महत्व नहीं दिखलाई दे रहा है। फिर भी हम आशावादी हैं। भारत ने स्पष्ट करदिया कि हमें गरीबी की कीमत पर पर्यावरण का संरक्षण नहीं करना है, क्योंकि कोपेनहेगन में जितने भी प्रतिनिधि उपस्थित थे वे समस्त अपने-अपने देश के हितों को संरक्षित करने के प्रति सजगता बता रहे थे न कि पर्यावरण में काबüन उत्सर्जन में कटौती के प्रति गम्भीर थे। कुल मिलाकर अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी पर्यावरण के मुद्दे पर समेलन करती रहे हम सब नागरिकों का कत्तüव्य है कि हम अपने आसपास के वातावरण को शुद्ध रखने का पूरा प्रयास कर अपनी सन्तति को स्वस्थ बनाए रखने में योगदान देकर अपने कत्तüव्य का निर्वहन करे।

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