Thursday, February 18, 2010
संपादकीय...चिन्ता, चिन्तन, चर्चा ही नहीं काफीदेर आए दुरुस्त आए, यह कहावत भले ही सच है पर देर की एक सीमा भी तो होती है।यदि उस सीमा से ज्यादा देर हो जाए तो उसके बाद कोई प्रयास, कोई भी उपचार काम नहीं करता है। तब केवल एक कहावत याद ाती है कि- अब पछताए क्या होत है जब चिçड़या चुग गई खेत। आज हम जलवायु को लेकर चिन्तित है, यह चिन्ता हमारी नहीं पूरी दुनिया की, हर पृथ्वीवासी की चिन्ता हो गई है। यहां यह कहकर आत्मसन्तोष की अनुभूति की जा सकती है कि जब जागे तभी सवेराहै। चलो सन्तोष कर लेने में बुराई भी कुछ खास नहीं। डेनमार्क की राजधानी कोपेन हेगन में जलवायु समेलन चल रहा है सारी दुनिया की नज़रें इस तथाकथित समुद्र मन्थन पर टिकी है। इस समुद्र मन्थन से किसको क्या मिलेगा, कितना अमृत निकलेगा, कितना गरल यह तो काल के गर्भ में छिपी स\"ााई है जो सामने आ ही जाएगी। आज इस समेलन के सुर्खियों में सजकर जोसमाचार सामने आ रहे हैं वह हम सबके सामने हैं। विकसित देशों की अपनी ढपली है, विकासशील देशों का अपना राग है, अविकसित देशों की अपनी पीढ़ा है, उन्हें तो अपने अस्तित्व पर ही संकट दिखाई पड़ रहा है।आज इस समेलन के मूल में जो मुय बिन्दु हमारे सामने है वह ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन। अब इन्हीं में से एक है काबüनडाइआक्साइड जो लगबग हर जीव श्वसन के दौरान तो उत्सर्जित करता ही है, परन्तु आज तमाम यान्त्रिक, एवं विज्ञान जनित गतिविधियों में इस गैस सहित अन्य छह ग्रीन हाउस प्रभाव रखने वाली का उत्सर्जन अधिक होने से मामला इतना अधिक गड़बड़ा गया है कि पूरी दुनिया को चिन्ता हो गई है। आज कोपेनहेगन में पूरी दुनिया के लोग जलवायु परिवर्तन पर चिन्ता, चिन्तन और चर्चा में जुटे हैं। हर देश की अपनी बात है, अपनी चिन्ता है, अपनी मजबूरी है। सबकी चाहत अमृत की है सो पूरी तब नहीं हुई जब समुद्र मन्थन हुआ था, आज तो बात ही अलग है, आज इस मन्थन से दायित्वों, जिमेदारियों, कत्तüव्यों का, कटौतियों का जो गरल निकलने की उमीद है वह पीने को कोई तैयार दिखाई नहीं देता है। हां, इसमें भारत का प्रयास प्रशंसनीय है कि उसने स्वयं ही 2भ् प्रतिशत कटौती की बात हटा रखी है। सही है भारत ही एक ऐसा देश है जहां प्रकृति की पूजा का प्रावधान है, भारत को पर्यावरण की महत्ता पूर्व से ही पता है यह उसे बताए जाने की आवश्यकता नहीं। हां याद जरुर करानी पड़ेगी। इस जलवायु समेलन के क्या ठोस परिणाम निकलेंगे, विकसित, विकासशील और अविकसित देशों के बीच क्या कोई बात बन पाती है। यह संभावना तभी प्रबल हो सकेगी जबकि चिन्ता, चिन्तन और चर्चा के अलावा भी कुछ हो अथाüत निष्कषोZ पर कुछ ठोस कदम उठे, जलवायु परिवर्तन जो नकारात्मक दिशा में मुड़ गए हैं वह वापस अपना सधा स्वरूप प्राप्त कर सकें। तब बात बने, अब केवल चिन्ता, चिन्तन और चर्चा से ही बात बनती नहीं दिखती है। अब आवश्यकता है ठोस कदमों की, नहीं तो फिर देर हो जाएगी, कल क्या होगा वह भी हमें ही अथाüत् धरती वासियों को ही भोगना होगा।
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