Thursday, February 18, 2010

संपादकीयक्या यही सबक काफी नहीं था?ऐसा लगता है कि यूपीए सरकार ने तेलंगाना राज्य की घोषणा करने के बाद उपजी परिस्थितियों से कोई सबक नहीं लिया। अगर सरकार ने सबक लिया होता तब वह जमू कश्मीर की स्वायत्तता का राग अलापना शुरू नहीं करती। जमू कश्मीर की स्थिति के सम्बंध विचारणी कई ऐसे बिन्दु है जो बहुत ही संवेदनशील कहे जा सकते हैं। आज जमू-कश्मीर की विशेष स्थिति कोलेकर गठित प्रधानमन्त्री को सौंप दी है। कार्यदल के सदस्य ही जमू कश्मीर को स्वायत्तता देने की शरमाते करने वाली रिपोर्ट को नामंजूर कर चुके हैं तथा इस सम्बंध में उनका कहना है कि पिछले 28 महीनों से कार्यदल की कोई बैठक नहीं आयोजित की गई है इसके बाद भी अचानक जस्टिस सगीर अहमद ने रिपोर्ट को जारी कर दिया। कार्यदल के सदस्य भाजपा के अरुण जेटली और माकपा नेता यूसुफ ने इस रिपोर्ट को धोखा बताया है। अगर हम यह कहें कि कश्मीर को स्वायत्तता के सवाल पर राजनीति में गर्माहट आ गई है तब अतिश्योçक्त नहीं होगी, तेलंगाना की तरह जमू में भारतीय जनता पार्टी रिपोर्ट के खिलाफ सड़कों पर उतरकर मोर्चा खोल सकती हैं और आधारभूत मुद्दा कार्यदल की रिपोर्ट को बनाया जा सकता है। इससे बची-खुची कांग्रेस गम्भीरतम स्थिति में न पहुंच पाए। कांग्रेस में तेलंगाना के प्रश्न पर पहले से झुलसी हुई है। कांग्रेस पार्टी के लिए कार्यदल की रिपोर्ट एक बड़ा संकट को लेकर आई है।कार्यदल रिपोर्ट में जमू कश्मीर में लागू धारा 370 को वर्तमान स्वरूप में कब तक जारी रखा जाए इस बात परविचारकरने की बात कही गई है। यह सिफारिश भारतीय जनता पार्टी की पुरानी मांग को स्वीकारती है इसी मांग को लेकर डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। वहीं पर कांग्रेस की धारा 370 को संविधान का अभिन्न हिस्सा मांग कर चल रही है और इसकेरहते स्वायत्तता देने की पक्षधर है। स्वतन्त्रता के पश्चात से केन्द्र सरकार ने जमू-कश्मीर को प्रयोगशाला के रूप में संरक्षित किया है। जमू कश्मीर की भौगोलिक स्थिति का भी उन्होंने कभी ध्यान नहीं रखा पं. जवाहरलाल नेहरू से लेकर राजीव गांधी के कार्यकाल तक जमू कश्मीर के साथ क्या हश्र किया उससे सभी लोग वाकिफ है। फिर भी कांग्रेस स्वायत्तता की आग से जमू कश्मीर को क्यों झुलसाना चाहते हैं और वह भी इस समय। क्या कांग्रेस को इस समय का ज्ञान नहीं है कि भाजपा जमू कश्मीर को तीन भागों में बांटने का प्रस्ताव उछाल सकती है। वहीं पर विहिप चार भागों मेंं बांटने की बात पर अड़ जायेगा।आज प्रश्न यह उठता है जमू कश्मीर को स्वायत्तता के मुद्दे को बाहर आते ही अन्य राज्यों द्वारा इस मांग का समर्थन नहीं किया जाएगा। कहने का मतलब यह है कि इस मांग को लेकर फिर तोड़फोड़ की राजनीतिक विसात बिछ नहीं जाएगी। इससमय अच्छा यही होगा कि कांग्रेस स्वायत्तता की किसी भी सिफारिशी रिपोर्ट पर बात न करते हुए उसे ठण्डे बस्ते के हवाले करके तेलंगाना में लगी आग को ठण्डा करने में अपनी ताकत लगाए।
संपादकीयझारखण्ड की नियतिझारखण्ड विधानसभा के चुनाव हो चुके हैं और परिणाम तथा सरकार के गठन की परिणति भी आपके सामने हैं। झारखण्ड राज्य बनने के बाद आज तक चुनाव में हारता चला आ रहा है और राज्य गठन के बाद से राजनीतिज्ञ जीतते आ रहे हैं। शिबू सोरेन तीसरी बार मुयमन्त्री बने हैं।पिछले वषोZ के दौरान 6 गठबंधन सत्तासीन हो चुके हैं यह सातवां गठबंधन सामने आया है। राज्य की अस्थिरता के कारण आज भी विकास की स्थिति यथावत है। मसलन हम जहां से सन् 2000 में उठे थे आज भी वहीं पर खड़े हैं। राज्य में जन उपयोगिता कीयोजनाएं जस की तस से भीनीचेके स्तर पर पहुंच चुकी है। अगर यह कहें कि राज्य में बिजली, पानी, स्वास्थ्य , सड़क आदि सुविधाओं का बंटाधार हो गया है तब अतिश्योçक्त नहीं होगी। हां एक मामले में झारखण्ड में कीर्तिमान स्थापित किया है वह है भ्रष्टाचार राज्य में भ्रष्टाचार शीर्ष पर है। राजनीतिज्ञों ने प्रदेश की सपदा से अपने घरों को भरा है प्रशासनिक अमला भी इस कृत्य में पीछे नहीं रहा है। आज कुछएक के सम्बंध में आय से अधिक सपçत्त की बात कहना या फिर भ्रष्टाचार का आरोप लगाना अलग बात है, परन्तु जिनके बारे में भ्रष्टाचार उजागर नहीं हुआ उनकीसंया कम नहीं है। इसपर भी राजनीतिज्ञ का एक ही अलाप कि राजनैतिक कारणों से राजनीतिज्ञों पर इस प्रकारके आरोप लगाए आते हैं। आश्चर्य उस समय होता है जब मधु कोड़ा की पत्नी चुनाव जीत जाती है। इस घटना से एक सन्देश बाहर निकल रहा है कि आदिवासी लूटें तब कोई बात नहीं बाहर के किसी भी व्यçक्त को बदाüस्त नहीं किया जाएगा। इसी तारतय में देखा जाए तब पूर्व मन्त्री एनोस एक्का और हरिनारायण राव जेल में रहते हुए चुनाव जीत गए। निगरानी जांचका सामना करने वाले नलिन सोरेन और बंधुतिकीü भी चुनावजीत गए हैं। इससे राज्य में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को क्षति पहुंची है। वहीं पर झारखण्ड की जनता ने भ्0 के लगभग दागी लोगों को चुनकर विधानसभा में पहुंचाया है। जिनमें से झारखण्ड मुक्त मोर्चा से 17 भारतीय जनता पार्टी से 8 तथा अजसुसे 4 सदस्य हैं।कुल मिलाकर खण्डित जनादेश ने झारखण्ड की विकास और नियति पर प्रश्नचिन्ह लगा रखा है। इससे कभी-कभी लगता है कि झारखण्ड का भविष्य क्या होगा? इस प्रदेश के गठन की मूलभूत अवधारणा किस दिन और कैसे मूर्तता प्राप्त करेगी?आज महत्वपूर्ण सवाल यह है कि झारखण्ड में भाजपा-शिबू सोरेन का एक-दूसरे के प्रति विश्वास किस करवट बैठेगा और कब तक बैठेगा शिबू सोरेन का अभी तक का इतिहास चिन्तामय है। चिन्तन को जन्म देता है परिणाम और कोई नहीं झारखण्ड की भोलीभाली जनता को भोगना पड़ेगा। नैतिकता अनैतिकता का बेजोड़ संगम राजनीति है। इस 2009 का गठबंधन झारखण्ड में विकास को नई दिशा दे ताकि हम कह सकें कि अबकी बार भाजपा की संगत ने असर दिखलाया है।
संपादकीयनियन्त्रित हो सकते हैं भाववित्तमन्त्री प्रणब मुखर्जी ने देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाए रखने और आर्थिक विकास दर को 8 प्रतिशत के मुहाने को लेने की जो आशा की थी उस तक पहुंचने में कामयाब हो गए हैं। उनकी सोची समझी आर्थिक रणनीति का ही परिणाम है कि भारत अपनी अर्थव्यवस्था को विश्व मन्दी के झंझावतो को झेलकर अडिग ही नहीं खड़ा है बल्कि प्रगति पथ पर अग्रसर है।वितमन्त्री प्रणब दा का आत्मविश्वास और द्वारा ही यह सब सम्भव हो सका है कारपोरेट क्षेत्र ने अपना कारोबार उत्पादन बढ़ाकर एवं घरेलू मांग के अनुरूप दुनिया में चल रही मन्दी को बेअसर कर दिया है।घरेलू मांग को बढ़ाने के लिए वित्तमन्त्री ने कार्पोरेट क्षेत्र से अपेक्षा की थी कि वह अपने मुनाफे में कटौती करके अपने-अपने उद्योगों से कर्मचारियों की छंटनी से परहेज कर उत्पादन को बढ़ाकर बाजार की मांग को पूरा करने का प्रयत्न करें तथा सरकार द्वारा दी जा रही रियायतों का उपयोग करें। तत्कालीन वित्तमन्त्री पी चिदबरम ने रिजर्व बैंक के द्वारा रोकड़ बढ़वाकर बैकिंग उद्योग को मन्दी की बयार से बचाकर रखा जिसकी वजह से सभी बैंक मजबूती के साथ अपना-अपना कार्य करा रहे हैं।दुनियां के देश भारत की इस कामयाबी से चकित ही नहीं अचंभित हैं कि विषमता में स्थिरता का मूलमन्त्र भारत की सरकार और जनता के पास है। भारतीय जनता ने बिना डगमगाए वैश्विक मन्दी से डटकर मुकाबला कर एक मिसाल कायम की है। असल में इस सम्बंध में जब बात ही चली है तब हम पूर्व प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी की दूरदर्शिता कि, उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके हमको बहुत बढ़ी ताकत दी थी। आज राष्ट्रीयकरण के कारण ही हम मन्दी की विश्व व्यापी बीमारी का मुकाबला करपाए हैं।विचार करने की बात है कि अमेरिका जैसे शçक्त सपन्न राष्ट्र भी विश्वव्यापी मन्दी से प्रभावित हुए बिना नहीं है वहीं पर हमारी मुद्रा रुपए की कीमत में जबरदस्त गिरावट को रोकना मुश्किल हो जाता।यह सही है कि हम खाद्य मोर्चे पर जनता की परेशानियों को कम नहीं कर पा रहे हैं। इसका मूल कारण उत्पादन की कमी है मांग ज्यादा है फिर भी एक बाद निश्चित है कि सब्जी आदि के भाव निश्चित रूप से कम होंगे जैसे-जैसे बाजार में उत्पादन आने लगेगा भाव नियन्त्रित होने लगेंगे।
संपादकीयजनहितैषी निर्णयकेन्द्र सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि आम नागरिक की किसी भी प्रकार की शिकायत को एक आई आर की मान्यता दी जाए। गृह मन्त्रालय राज्य सरकारों के माध्यम से थानों में पंजीकृत होने वाली शिकायतों पर कार्यवाही के सम्बंध में स्पष्ट दिशा-निदेüश देगी कि जनता की शिकायत तकलीफ को गम्भीरता से लिया जाकर उसका निदान किया जाए।केन्द्र सरकार की यह भावना सराहनीय एवं जनहितौषी है। होना भी यही चाहिए कि अत्याचारी दण्डित हो अत्याचार पर अंकुश लगे समाज में सुख-शान्ति का वातावरण निर्मित है। एक-दूसरे में अपनत्व भाईचारा बड़े आदि ईमानदार समाज के लिए इस प्रकार के उपक्रम सार्थक सिद्ध होंगे मगर बेईमान धूर्त समाज इस शा का दुरुपयोग करना शुरू कर दे जो केन्द्र सरकार हर शिकायत को एफ.आई.आर. की मान्यता दे। परन्तु उसके साथ ही यह प्रावधान भी रखे कि अत्याचारी एवं बेईमान धनवली बाहुबली उसका दुरुपयोग कर सच्चे और ईमानदार व्यçक्त पर दुरुपयोग न कर पाए। अगर हम इतिहास में जाकर देखे तब हमारे यहां का पुलिस संगठन की संरचना ब्रिटिश कालीन है। उसके काम करने का ढंग भी ब्रिटिश कालीन अवधारणा पर आधारित है। मसलन कि शिकायत कर्ता को यह सिद्ध करना होगा कि उसकी शिकायत रही है उस पर अत्याचार किया जा रहा है। जबकि व्यवहार में देखा जाए अत्याचारी अपने आपको सीधा-सा बचा ले जाता है या फिर अत्याचारी भी क्रास केस तैयार कर अपने को सुरक्षित कर लेता है।पुलिस विभाग की वृçत्त प्रवृçत्त एवं काम करने का ढंग से सम्भवतज् केन्द्र सरकार सुपरिचित हो। वर्तमान कार्य पद्धति के अनुसार एफ.आई.आर. दर्ज कर लेने का अभिप्रायज् पुलिस विभाग के कुछ कारिन्दों की आमदनी में बढ़ोतरी करना है जो राजकोष में न पहुंचकर निजी कोष में पहुंचती है। आज पुलिस विभाग की कार्यपद्धति स्थिति से हम सभी अच्छी तरह वाकिफ है। वर्तमान परिस्थितियों में किसी प्रकार की कोई सकारात्मक कार्यवाही हो सकती ऐसी संभावना कम है। संभावना तो यह अधिक है कि उल्टी इस व्यवस्था से आम जनता का और अधिक शोषण होने लगेगा।आज स्वतन्त्र हुए 62 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं पर हम लोकतन्त्र के आधारभूत बिन्दुओं को भी अमल नहीं कर पाए। बात तो हम लोकतन्त्र की करते हैं पर व्यवहार में हम सभी सामन्तवादी अवधारणों के उपासक हैं। हमारे प्रत्येक कदम अधिनायकवादी एवं सामन्तवाद की पृष्ठ भूमि पर खड़ा है। लोकतन्त्र का अभिप्रायज् जनता की सरकार जनता के लिए होना है परन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं है। जन प्रतिनिधिय स्वयं को सेवक के तौर पर प्रस्तुत करके चुनाववाद अस्थायी मालिकाना तक प्राप्त कर लेते हैं। यही स्थिति प्रशासनिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों की है वह तो स्वयं को स्थायी मालिक मानकर चलते हैं।कुल मिलाकर केन्द्र सरकार का राज्य सरकार पुलिस की कार्यपद्धति एवं उनके क्रिया-कलापों की बारीकियों को अच्छी तरह जानती है ऐसे में किसी भी शिकायत को एक एफ.आर.आर. की मान्यता मिल जाने से जनता की तकलीफ बढ़ न जाए इस पर यह बात की सरकार को सुनिश्चित करनी होगी।
संपादकीयतौलनी होंगी तैयारियांभारत की राजधानी नई दिल्ली में आगामी वर्ष में राष्ट्रमण्डल खेलों का महाआयोजन होने जा रहा है। हम इस खेल महाकुंभ की मेजबानी करने जा रहे हैं, इसके लिए राजधानी को सजाया जा रहा है संवारा जा रहा है, ताकि विश्व की नज़रों में हमारी अतिथि देवो भव की परपरा अपने सही, स्वरूप में आ सके।यह अलग बात है कि फिलहाल बहुत-सी बातें उठ रही हैं, एक तरफ कहा जा रहा है कि तैयारियों में तेजी की कमी है, यही वजह है कि लगता कि तैयारियां समय पर पूरी हो सकेंगी अथवा नहीं। उधर आयोजन पक्ष का दावा है कि कहीं दूर-दूर तक दिक्कत नहीं है, तैयारियां ठीक चल रही हैं। सब कुछ समय पर हो जाएगा।उधर भारत को वल्र्डकप 2011 के कुछ क्रिकेट मैचों की मेजबानी का मौका भी सामने है। विश्व स्तरीय खेल आयोजनों की मेजबानी का अवसर कितना महत्वपूर्ण होता है यह सर्वविदित है। पर इन सब स्वणिüम संभावनाओं के चलते यदि कुछ ऐसा घट जो जो अप्रिय हो तो संभावनाओं पर साया सा पड़ता दिखने लगता है। कोटला की पिच का श्रीलंका की टीम द्वारा नकार दिया जाना अपने आपमें एक महत्वपूर्ण घटना है गौरतलब है कि यह पिच उसी दिल्ली में है जहां पर खेल महाकुंभ होना है। हालांकि इन दोनों बातों का आपस में सीधा सम्बंध नहीं है, परन्तु क्या इस तरह से अन्तर्राष्ट्रीय पिच का गुणवत्ता से कमतर होना कोई बेहतर संकेत है। पिच के कारण मैच का रद्द हो जाना तीन साल तक के प्रतिबंध का कारण भी बन सकता है। तब इसका 2011 में होने वाले विश्वकप मैचों की मेजबानी पर क्या असर पड़ेगा कल्पना की जा सकती है क्योंकि यहां ग्रुप स्टेज के चार मैच 2011 में होना प्रस्तावित है। अब यह विषय जांच का तो है ही कि आखिर पिच कैसे खराब हो गई, उसकी तैयारी में कहां पर कौन-सी कमजोरी रह गई कि नतीजा यूं सामने ाया। इस मामले में या तो डीडीसीए को मात्र चेतावनी देकर छोड़ा जा सकता है अथवा उस पर जुर्माना भी लग सकता है। इन सबके अतिरिक्त जो अधिकतम दण्ड दिया जा सकता है वह यह कि सेंटर पर तीन वर्ष के लिए प्रतिबंध लग जाए, नतीजा 2011 में मेजबानी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।अब यहां पर चिन्तन का विषय यह है कि आखिर वे क्या परिस्थितियां और कारण है कि जिनके चलते इतनी लापरवाही हो गई कि पिच मैच पूरा होने से पहले ही जवाब दे गई और बॉलर्स द्वारा फेंकी गई बाल्स खतरनाक तरीके से उछलीं, जिससे बल्लेबाज खासे परेशान हो गए। यह तो शुक्र है कि इन उछलती गेन्दों की चपेट में कोई खिलाड़ी नहीं आया अन्यथा तो मामला और गम्भीर हो जाता। हालांकि मैच इस पिच पर 23.भ् ओवर तक चला परन्तु आज जब हमारे यहां खेलों का महाकुंभ होने जा रहा है, 2011 में हमें वल्र्डकप मैचों की मेजबानी करनी है तो क्या यह खामी सामान्य कही जा सकती है।खिलाçड़यों की हमारे यहां क्या हालत है वह समय-समय पर सुर्खियां बयां कर देती है कि फलां चैçपयन ाज यूं अपना भरण पोषण कर रहा है, क्योंकि उसकी कोई पूछ परख करने वाला है ही नहीं। अब कल्पना करें कि यदि इस तरह की लापरवाही या गड़बड़ी फिर हुई तो हमारी छवि कैसी बनेी? क्रिकेट प्रेमी तो इस घटना से खासे निराश हुए ही हैं, खेल जगत ने भी इसके क्या मायने लगाए। होंगे अनुमान लगाया जा सकता है पर जब विश्व स्तरीय आयोजन होंगे और तब कुछ होता है तो परिणामों पर विचार होना जरूरी है। अतज् आज आवश्यकता इस बात की तो है ही कि यह जो कुछ भी हुआ उस पर सही, सटीक कठोर कार्रवाई हो, साथ ही साथ इस तरह की घटनाओं की पुनरावृçत्त न हो इसके लिए हमें हर स्तर पर अपनी तैयारियों को तौलना होगा।
संपादकीयजमू कश्मीर, तमिलनाडु के रास्ते पर झारखण्डअभी हाल में ही झारखण्ड में हुए विधानसभा चुनाव में दोनों ही राष्ट्रीय राजनैतिक पाटिüयों कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने झारखण्ड मुçक्तमोर्चा के नेता और प्रत्याशियों पर आक्रमण पर आक्रमण करके चुनावी समर में अपने-अपने पक्ष में कसीदे पढ़े। परिणामस्वरूप झारखण्ड मुçक्त मोर्चा 18 सीटों पर विजय हासिल करके पहले के मुकाबले अधिक शçक्त के साथ उभरकर आई है। इससे एक सन्देश झारखण्ड के मतदाताओं ने दिया है कि झारखण्ड मुçक्त मोर्चा का जमीनी आधार अन्य राष्ट्रीय राजनैतिक पाटिüयों के समकक्ष ही है। प्रश्न उठता है कि झारखण्ड मुçक्त मोर्चा के नेताओं पर विभिन्न आपराधिक प्रकरण पंजीबद्ध है फिर भी जनता में वे सभी लोकप्रिय है। इसका सीधा-सा जवाब जो हमारी समझ में आ रहा है कि झारखण्ड की जनता अपने मनोविज्ञान को प्रमुखता देती है। उसे बाहर का नहीं अपनी संस्कृति का प्रतिनिधि चाहिए। साथ ही एक कहावत है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती झारखण्ड मुçक्त मोर्चा के प्रतिनिधि अपने मतदाताओं से बेहद सशक्त तरीके से जुड़े हुए हैं। यही बात निदüलीय प्रतिनिधियों एवं कांग्रेस के सहयोगी झारखण्ड विकास मोर्चा ने भी 11 स्थानों पर जीत हासिल की है। इसका सीधा-सा अर्थ है कि झारखण्ड के रीब आदिवासी लोग यह जानते हैं कि उनकी प्राकृतिक संपदा से भरे प्रदेश को अपने ही लोग उपभोग करें। झारखण्डी इसी प्रकृति के कारण स्थिर सरकार नहीं दे पाए।अभी तक के चुनाव परिणामों का विश्लेषण किया जाए तब हम कह सकते हैं कि किसी भी राजनैतिक दल को मतदाताओं ने पूर्ण बहुमत नहीं दिया। झारखण्ड की जनता पर न तो राहुल गांधी का न ही सोनिया गांधी का और न ही भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी का जादू प्रभावित कर पाया है उसने तो अपनी संस्कृति अपनी सोच के अनुसार निर्णय दिया है।चुनाव परिणाम के बाद झारखण्ड मुçक्त मोर्चा भाजपा के साथ जाता है या कांग्रेस के साथ इससे कोई खास अन्तर नहीं पड़ता, हां अन्तर पड़ेगा इस बात पर कि जनता की मूल समस्या के लिए मौन जागरूक रहता है। अभी हाल में भारतीय जनता पार्टी के नेता राजनाथ सिंह और यशवन्त सिन्हा ने स्थानीय जनता की दुखती नब्ज पर हाथ रखकर नई सरकार बनाने के लिए आधार बिन्दु स्थापित किए हैं। झारखण्ड की जनता अपने ादमी से क्षेत्र का विकास चाहती है। कुल मिलाकर झारखण्ड भी जमू-कश्मीर, तमिलनाडु, बिहार, महाराष्ट्र जैसे राज्यों की क्षेत्र में आ गया है जहां राष्ट्रीय दलों को सरकार बनाने के लिए या तो क्षेत्रीय दलों को समर्थन देना पड़ता है। या लेना पड़ता है। भाजपा ने पुरानी सभी बातें भुलाते हुए झामुओ को सरकार बनाने के लिए समर्थन देना निश्चित ही झारखण्ड के विकास का रास्ता साफ किया है और यही समय की मांग है।
संपादकीयसमर्पण से स्थिरता सम्भवझारखण्ड विधानसभा केचुनाव आदेश परिणाम ने प्रदेश की राजनैतिक अस्थिरता को बनाए रखने का संकेत देकर यह बतलाए जाने का संकेत दिया है कि राजनीतिक दलों के नाम कितने भी रख लो सबके सबके सब एक समान है कोई नागनाथ है तो कोई सांपनाथ है। सबके सब जनता की मेहनत की कमाई का उपभोग कर जनसेवक कहलाते हैं। किसी में कोई अन्तर नहीं दिखलाई देता है। एक भी पार्टी में वास्तविक जनप्रतिनिधि नहीं है अगर किसी पार्टी में जनता के प्रति समर्पित व्यçक्त हो तो तब निश्चित ही उन्हें विधानसभा में भेजा जाता औरयदि नकारात्मक वोट की व्यवस्था होती तब निश्चिततौर पर झारखण्ड की जनता अपने विचारों की अभिव्यçक्त नकारात्मक वोट देकर झारखण्ड विधानसभा के वर्तमान परिणाम त्रिशंकु सरकार बनाने के लिए भी इजाजत नहीं देती है। ईमानदारी वाली बात तो यह है कि चुनाव पूर्व जिन-जिन पाटिüयों ने गठबंधन करके चुनाव लड़ा था। उनमें से एक के भी पास बहुमत नहीं है। ऐसी स्थिति में अगर कोई संगठन या पार्टी समर्थन देता है। तब वह जनता द्वारा दिया गया आदेश का उल्लंघन करने की श्रेणी में आएगा।कांग्रेस और भाजपा दोनों ही राष्ट्रीय पाटिüयां बहुमत से दूर है। पिछले चुनाव को आधार मानकर यदि विचार करें तब कांग्रेस की ताकत बढ़ी है और भाजपा से जनता ने मुंह मोड़ लिया है। दोनों ही राष्ट्रीय पाटियां क्षेत्रीय पाटिüयों को नुकसान नहीं पहुंचा पाई है बल्कि क्षेत्रीय पाटिüयों के भाव बढ़ गए हैं। सौदेबाजी के नए-नए आयाम खुले हैं। बोली भी ऊंची होने की संभावना है।झारखण्ड के प्रथम मुयमन्त्री बाबूलाल मराण्डी की शçक्त बढ़ी है। मराण्डी की नई पार्टी झारखण्ड विकास पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था पर बहुमत में पीछे रह गए।झारखण्ड की बात करते समय झारखण्ड मुक्त मोर्चा के नेता शिबू सोरेन को नकारा नहीं जा सकता अबकी बार वह अच्छी साहूकारी स्थिति में है। झारखण्ड की जनता ने क्षेत्रीय पाटिüयों को पूरा समर्थन देते हुए चेतावनी दी है कि अभी भी वक्त है सुधर जाओ अकेले अपने बूते पर सरकार बनाने के लिए जनता में घुसना पड़ेगा, काम करना पड़ेगा। तभी झारखण्ड के मतदाता तुमको परखने का अवसर देंगे।प्राकृतिक सपदा से भरपूर झारखण्ड राज्य सरकार बनाने के लिए आदिवासी मुयमन्त्री चाहता है चाहे वह मराण्डी हो या शिबू सोरेन हो बिना इनके समर्थन के कुछ ही हासिल नहीं हो सकता। अब प्रश्न यह उठता है कि यूपीए इसको मूर्तरूप कैसे दे। बले ही शिबू सोरेन को कांग्रेस ने बहलाना-फुसलाना शुरू कर दिया है। कांग्रेस का मुयमन्त्री बनवाने के बदले में केन्द्र में मन्त्री पद देने का प्रस्ताव मानने को कह रहे हैं। मगर पता चला है कि यह प्रस्ताव शिबू सोरेन मंजूर नहीं है। कांग्रेसी मैनेजरों की निगाह राज्य के माइन्स मिनरल पर है।अभी तक के प्रयासों में झारखण्ड में सरकार बनाना इतना आसान नहीं है। ऐसे वातावरण में इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि पाटिüयों के कुछ मैनेजर खरीद-फरोत के द्वारा सरकार बनाने में लगे हुए हो। नई सरकार के लिए राज्यपाल की जिमेदारी महत्वपूर्ण है। लगता है कि भारतीय जनता पार्टी ने इस स्थिति का आकलन करलिया है तभी तो यशवन्त सिन्हा ने कहा है कि भाजपा को सरकार नहीं बनानी चाहिए। यशवन्त सिन्हा का वक्तव्य इस बात का संकेत दे रहा है कि चुनाव बाद नया गठबंधन ऐसा बनेगा जिससे सब कुछ अच्छा नहीं होगा। शिबू सोरेन ने चुनाव पूर्व कांग्रेस से समझौता नहीं किया इसलिए आज वह स्वतन्त्र है। वह कांग्रेस भाजपा में से किसी से भी हाथ मिलाकर सत्ता के लड्डू गपक सकते हैं। कांग्रेस के साथ मराण्डी है। मराण्डी और शिबू सोरेन में आदिवासी नेतृत्व की जंग जगजाहिर है। झारखण्ड में स्थिति विकट और गम्भीर है इसलिए राज्यपाल की भूमिका अधिक महत्व रखती है।झारखण्ड में लालू प्रसाद के छह विधायकों का अपना महत्व है। सपूर्ण गठित लगाने, और खरीद फरोत के बाद कहीं निदüलीय मधुकोड़ा का इतिहास दोहरा न जाए। यह स्थिति राज्य के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती है। चुनाव पूर्व गठबंधन पर एक नज़र डाले तब कांग्रेस के साथ बाबूलाल मराण्डी जो हिन्दू आधारित संस्कृतिक स्वभाव के हैं कैसे साथ रह सकते हैं? इसी प्रकार भारतीय जनता पार्टी के साथ जनता दल यू जो मूलरूप से हिन्दूवादी विचारधारा के विरोधी हैं। किसी भी प्रकारसे सत्ता की खातिर सरकार बन भी गई तब उसकी उम्र कितनी होगी यह भी विचारणीय होना चाहिए।कुल मिलाकर मतदाता राजनीतिज्ञों, राजनीतिक पाटिüयों और उनके मैनेजरों के कपड़े उतारकर उन्हें बेनकाब करना चाहती है ताकि राष्ट्रीय पाटिüयों की मनोदशा उनके थोथे वायदे और मतदाता के प्रति समर्पण उजागर हो सके। झारखण्ड की आदिवासी जनता राजनीतिक शोषकों को यह सबक सिखलाना चाहती है कि अभी तक हमारी सपçत्त को लूटकर बड़े आदमी बनते रहे और हमको गरीबी में ढकेलते रहे यह नहीं चल पाएगा। नेताओं समाज और देश के प्रति समर्पण करना सीखो उस स्थिति में ही राजनैतिक स्थिरता सम्भव हो सके।