Thursday, February 18, 2010
संपादकीय....क्या बन सकते हैं इतने राज्यलोकतन्त्र की सफलता इसी पर निर्भर है कि जितना सुदृढ़ पक्ष हो उतना ही दृढ़ विपक्ष हो, वह पूरी दृढ़ता के साथ अपनी बात रखे। परन्तु तेलंगाना का गाना बजते ही जो धूम धड़ाका हुआ वह लोकतन्त्र के लिए कहीं से कहीं तक ठीक प्रतीत नहीं होता है।इधर केन्द्र सरकार ने इस राज्य की मांग के पीछे की गम्भीरता को समझते हुए, आमरण अनिश्चितकालीन अनशन जैसे बापू के शçक्तशाली आज के सामने झुकते हुए घोषणा की और तेलंगाना अलग राज्य बनाए जाने को हरी झण्डी दी। इस घटना ने एक बात तो सिद्ध कर ही दी कि महात्मा गांधी के वह तरीके जिनके सामने ब्रिटेन की विश्व व्यापी सल्तनत को घुटने टेकना पड़े थे, वह तरीके आज भी औचित्यपूर्ण है। पर यह क्या केन्द्र द्वारा एक हरी झण्डी दिए जाते ही एक दम से कई सारी लाल झण्डियां सामने आ गईं, यहां तो न्यूटन जैसे महान वैज्ञानिक का गति का वहनियम ही फैल हो गया जिसमें उन्होंने कहा था कि हर क्रिया को ठीक बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। यहां क्रिया तो अभी बस शुरू ही हुई थी कि प्रतिक्रिया ने सबको अचभे में डाल दिया। आंध्र में तो मानो घमासान ही छिड़ गया। टप-टप कर इस्तीफों की बौछार होने लगी और देखते ही देखते मामला शतक को लांघ गया, बात विधायकों की ही नहीं है। सांसद भी मैदान में उतर पड़े। उन्होंने भी इस्तीफे सौंपना शुरू कर दिए। यही नहीं विरोध में तो स्वयं कांग्रेस के ही लोग उठ खड़े हुए नतीजा खुद कांग्रेस और केन्द्र ही सांसत में आ गए हैं और कांग्रेस की सुप्रीमो सोनिया गांधी को सबकी राय तैयार करने के प्रयास प्रारंभ करने पड़ गए।उधर एक दूसरी बात और चल निकली अमन में बोडोलैण्ड और महाराष्ट्र में विदर्भ और बुन्देलखण्ड जैसे अलग राज्यों की मांग भी उठने लगी। अब संकट यह है कि यह कि केन्द्र सरकार को यह कल्पना भी नहीं रही होगी कि ऐसा कुछ होगा, और सामने अनशन जैसा अकाट्य अ तो श्री राव ताने बैठे ही थे। अब केन्द्र की हालत तो तय है कि सांप छछून्दर सी हो गई है। मामला गले में फंसा ही समझो अब न तो बात उगलते बनेगी न ही मामला निकलते बनेगा। यह सही है कि विकेन्द्रीकरण के अपने लाभ होते हैं सत्ता की इकाई जितनी लघु होगी उतनी ही लाभकारी होगी। यह माना जाता रहा है। इसी सोच के साथ ही सम्भवतज् पंचायती राज को अपनाया गया पर इसके जो परिणाम सामने आए वह यह कि सत्ता के विकेन्द्रीकरण के साथ ही उन सब चीजों का भी विकेन्द्रीकरण हो जाता है जो कि सत्ता के साथ-साथ चलती है। मतलब यह कि भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार की दीमक के उतने ही बिन्दु हो जाते हैं उतने ही केन्द्र हो जाते हैं जितने सत्ता के, सो उतने ही मोचोZ पर निपटने की भी आवश्यकता पड़ती दिखाई देती है, माना यह रहा है कि जितनी इकाई छोटी होगी उतना ही नियन्त्रण बेहतर होगा।खैर इस सबके जो परिणाम सामने हैं जिस तरह से अलग राज्यों की मांग ने मुंह खोल दिया है उससे तो साफ लगता है कि राज्य यूं ही बनते गए तो स्थितियां निश्चय ही उतनी बेहतर नहीं होंगी जितनी कभी सोची गईं थी उल्टा मामला माइनस में जा सकता है। अब तो लगता है कि आवश्यकता एक बार फिर विचार की है हमें एक बार फिर सोचना होगा कि क्या किया जाए, क्या नहीं। साथ ही इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि इस तरह से अलग राज्यों की बढ़ती मांग के पीछे की मंशा क्या है, क्योंकि किसी भी क्रिया के ठीक होने, गलत होने या अपराध होने के भी केवल मंशा ही मूल होती है। यदि किसी का पेट कोई रोग ठीक करने के लिए काटा जाए तो वह ऑपरेशन हो जाता है और पेट काटने वाला शल्य चिकित्सक हो जाता है और यदि दूसरी तरफ देखें तो पता चलता है कि पेट किसी को जाने से मारने काटा जाए तो वह हत्या का प्रयास हो जाता है और उसका कर्ता अपराधी हो जाता है। अतज् मूल मंशा है यदि अलग राज्य की मांग के पीछे मंशा विकास है सुदृढ़ नियन्त्रण है तो ठीक यदि पद लोलुप्ता, मुयमन्त्री या मन्त्री की कुर्सी की चाह है या अलगाववाद के अंगारे उसे आंच दे रहे हैं तो तय है कि आज आवश्यकता एक बार फिर विचार की है क्या अलग राज्य की मांग ठीक है फिर वह बात तेलंगाना की हो बुन्देलखण्ड की हो या मामला विदर्भ का हो या पिर बात बोडोलैण्ड की हो। क्या हम इतने अलग राज्य बना सकते हैं या बनाना ठीक होंगे।
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