Thursday, February 18, 2010

संपादकीयक्या यही सबक काफी नहीं था?ऐसा लगता है कि यूपीए सरकार ने तेलंगाना राज्य की घोषणा करने के बाद उपजी परिस्थितियों से कोई सबक नहीं लिया। अगर सरकार ने सबक लिया होता तब वह जमू कश्मीर की स्वायत्तता का राग अलापना शुरू नहीं करती। जमू कश्मीर की स्थिति के सम्बंध विचारणी कई ऐसे बिन्दु है जो बहुत ही संवेदनशील कहे जा सकते हैं। आज जमू-कश्मीर की विशेष स्थिति कोलेकर गठित प्रधानमन्त्री को सौंप दी है। कार्यदल के सदस्य ही जमू कश्मीर को स्वायत्तता देने की शरमाते करने वाली रिपोर्ट को नामंजूर कर चुके हैं तथा इस सम्बंध में उनका कहना है कि पिछले 28 महीनों से कार्यदल की कोई बैठक नहीं आयोजित की गई है इसके बाद भी अचानक जस्टिस सगीर अहमद ने रिपोर्ट को जारी कर दिया। कार्यदल के सदस्य भाजपा के अरुण जेटली और माकपा नेता यूसुफ ने इस रिपोर्ट को धोखा बताया है। अगर हम यह कहें कि कश्मीर को स्वायत्तता के सवाल पर राजनीति में गर्माहट आ गई है तब अतिश्योçक्त नहीं होगी, तेलंगाना की तरह जमू में भारतीय जनता पार्टी रिपोर्ट के खिलाफ सड़कों पर उतरकर मोर्चा खोल सकती हैं और आधारभूत मुद्दा कार्यदल की रिपोर्ट को बनाया जा सकता है। इससे बची-खुची कांग्रेस गम्भीरतम स्थिति में न पहुंच पाए। कांग्रेस में तेलंगाना के प्रश्न पर पहले से झुलसी हुई है। कांग्रेस पार्टी के लिए कार्यदल की रिपोर्ट एक बड़ा संकट को लेकर आई है।कार्यदल रिपोर्ट में जमू कश्मीर में लागू धारा 370 को वर्तमान स्वरूप में कब तक जारी रखा जाए इस बात परविचारकरने की बात कही गई है। यह सिफारिश भारतीय जनता पार्टी की पुरानी मांग को स्वीकारती है इसी मांग को लेकर डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपने सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था। वहीं पर कांग्रेस की धारा 370 को संविधान का अभिन्न हिस्सा मांग कर चल रही है और इसकेरहते स्वायत्तता देने की पक्षधर है। स्वतन्त्रता के पश्चात से केन्द्र सरकार ने जमू-कश्मीर को प्रयोगशाला के रूप में संरक्षित किया है। जमू कश्मीर की भौगोलिक स्थिति का भी उन्होंने कभी ध्यान नहीं रखा पं. जवाहरलाल नेहरू से लेकर राजीव गांधी के कार्यकाल तक जमू कश्मीर के साथ क्या हश्र किया उससे सभी लोग वाकिफ है। फिर भी कांग्रेस स्वायत्तता की आग से जमू कश्मीर को क्यों झुलसाना चाहते हैं और वह भी इस समय। क्या कांग्रेस को इस समय का ज्ञान नहीं है कि भाजपा जमू कश्मीर को तीन भागों में बांटने का प्रस्ताव उछाल सकती है। वहीं पर विहिप चार भागों मेंं बांटने की बात पर अड़ जायेगा।आज प्रश्न यह उठता है जमू कश्मीर को स्वायत्तता के मुद्दे को बाहर आते ही अन्य राज्यों द्वारा इस मांग का समर्थन नहीं किया जाएगा। कहने का मतलब यह है कि इस मांग को लेकर फिर तोड़फोड़ की राजनीतिक विसात बिछ नहीं जाएगी। इससमय अच्छा यही होगा कि कांग्रेस स्वायत्तता की किसी भी सिफारिशी रिपोर्ट पर बात न करते हुए उसे ठण्डे बस्ते के हवाले करके तेलंगाना में लगी आग को ठण्डा करने में अपनी ताकत लगाए।
संपादकीयझारखण्ड की नियतिझारखण्ड विधानसभा के चुनाव हो चुके हैं और परिणाम तथा सरकार के गठन की परिणति भी आपके सामने हैं। झारखण्ड राज्य बनने के बाद आज तक चुनाव में हारता चला आ रहा है और राज्य गठन के बाद से राजनीतिज्ञ जीतते आ रहे हैं। शिबू सोरेन तीसरी बार मुयमन्त्री बने हैं।पिछले वषोZ के दौरान 6 गठबंधन सत्तासीन हो चुके हैं यह सातवां गठबंधन सामने आया है। राज्य की अस्थिरता के कारण आज भी विकास की स्थिति यथावत है। मसलन हम जहां से सन् 2000 में उठे थे आज भी वहीं पर खड़े हैं। राज्य में जन उपयोगिता कीयोजनाएं जस की तस से भीनीचेके स्तर पर पहुंच चुकी है। अगर यह कहें कि राज्य में बिजली, पानी, स्वास्थ्य , सड़क आदि सुविधाओं का बंटाधार हो गया है तब अतिश्योçक्त नहीं होगी। हां एक मामले में झारखण्ड में कीर्तिमान स्थापित किया है वह है भ्रष्टाचार राज्य में भ्रष्टाचार शीर्ष पर है। राजनीतिज्ञों ने प्रदेश की सपदा से अपने घरों को भरा है प्रशासनिक अमला भी इस कृत्य में पीछे नहीं रहा है। आज कुछएक के सम्बंध में आय से अधिक सपçत्त की बात कहना या फिर भ्रष्टाचार का आरोप लगाना अलग बात है, परन्तु जिनके बारे में भ्रष्टाचार उजागर नहीं हुआ उनकीसंया कम नहीं है। इसपर भी राजनीतिज्ञ का एक ही अलाप कि राजनैतिक कारणों से राजनीतिज्ञों पर इस प्रकारके आरोप लगाए आते हैं। आश्चर्य उस समय होता है जब मधु कोड़ा की पत्नी चुनाव जीत जाती है। इस घटना से एक सन्देश बाहर निकल रहा है कि आदिवासी लूटें तब कोई बात नहीं बाहर के किसी भी व्यçक्त को बदाüस्त नहीं किया जाएगा। इसी तारतय में देखा जाए तब पूर्व मन्त्री एनोस एक्का और हरिनारायण राव जेल में रहते हुए चुनाव जीत गए। निगरानी जांचका सामना करने वाले नलिन सोरेन और बंधुतिकीü भी चुनावजीत गए हैं। इससे राज्य में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को क्षति पहुंची है। वहीं पर झारखण्ड की जनता ने भ्0 के लगभग दागी लोगों को चुनकर विधानसभा में पहुंचाया है। जिनमें से झारखण्ड मुक्त मोर्चा से 17 भारतीय जनता पार्टी से 8 तथा अजसुसे 4 सदस्य हैं।कुल मिलाकर खण्डित जनादेश ने झारखण्ड की विकास और नियति पर प्रश्नचिन्ह लगा रखा है। इससे कभी-कभी लगता है कि झारखण्ड का भविष्य क्या होगा? इस प्रदेश के गठन की मूलभूत अवधारणा किस दिन और कैसे मूर्तता प्राप्त करेगी?आज महत्वपूर्ण सवाल यह है कि झारखण्ड में भाजपा-शिबू सोरेन का एक-दूसरे के प्रति विश्वास किस करवट बैठेगा और कब तक बैठेगा शिबू सोरेन का अभी तक का इतिहास चिन्तामय है। चिन्तन को जन्म देता है परिणाम और कोई नहीं झारखण्ड की भोलीभाली जनता को भोगना पड़ेगा। नैतिकता अनैतिकता का बेजोड़ संगम राजनीति है। इस 2009 का गठबंधन झारखण्ड में विकास को नई दिशा दे ताकि हम कह सकें कि अबकी बार भाजपा की संगत ने असर दिखलाया है।
संपादकीयनियन्त्रित हो सकते हैं भाववित्तमन्त्री प्रणब मुखर्जी ने देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाए रखने और आर्थिक विकास दर को 8 प्रतिशत के मुहाने को लेने की जो आशा की थी उस तक पहुंचने में कामयाब हो गए हैं। उनकी सोची समझी आर्थिक रणनीति का ही परिणाम है कि भारत अपनी अर्थव्यवस्था को विश्व मन्दी के झंझावतो को झेलकर अडिग ही नहीं खड़ा है बल्कि प्रगति पथ पर अग्रसर है।वितमन्त्री प्रणब दा का आत्मविश्वास और द्वारा ही यह सब सम्भव हो सका है कारपोरेट क्षेत्र ने अपना कारोबार उत्पादन बढ़ाकर एवं घरेलू मांग के अनुरूप दुनिया में चल रही मन्दी को बेअसर कर दिया है।घरेलू मांग को बढ़ाने के लिए वित्तमन्त्री ने कार्पोरेट क्षेत्र से अपेक्षा की थी कि वह अपने मुनाफे में कटौती करके अपने-अपने उद्योगों से कर्मचारियों की छंटनी से परहेज कर उत्पादन को बढ़ाकर बाजार की मांग को पूरा करने का प्रयत्न करें तथा सरकार द्वारा दी जा रही रियायतों का उपयोग करें। तत्कालीन वित्तमन्त्री पी चिदबरम ने रिजर्व बैंक के द्वारा रोकड़ बढ़वाकर बैकिंग उद्योग को मन्दी की बयार से बचाकर रखा जिसकी वजह से सभी बैंक मजबूती के साथ अपना-अपना कार्य करा रहे हैं।दुनियां के देश भारत की इस कामयाबी से चकित ही नहीं अचंभित हैं कि विषमता में स्थिरता का मूलमन्त्र भारत की सरकार और जनता के पास है। भारतीय जनता ने बिना डगमगाए वैश्विक मन्दी से डटकर मुकाबला कर एक मिसाल कायम की है। असल में इस सम्बंध में जब बात ही चली है तब हम पूर्व प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी की दूरदर्शिता कि, उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके हमको बहुत बढ़ी ताकत दी थी। आज राष्ट्रीयकरण के कारण ही हम मन्दी की विश्व व्यापी बीमारी का मुकाबला करपाए हैं।विचार करने की बात है कि अमेरिका जैसे शçक्त सपन्न राष्ट्र भी विश्वव्यापी मन्दी से प्रभावित हुए बिना नहीं है वहीं पर हमारी मुद्रा रुपए की कीमत में जबरदस्त गिरावट को रोकना मुश्किल हो जाता।यह सही है कि हम खाद्य मोर्चे पर जनता की परेशानियों को कम नहीं कर पा रहे हैं। इसका मूल कारण उत्पादन की कमी है मांग ज्यादा है फिर भी एक बाद निश्चित है कि सब्जी आदि के भाव निश्चित रूप से कम होंगे जैसे-जैसे बाजार में उत्पादन आने लगेगा भाव नियन्त्रित होने लगेंगे।
संपादकीयजनहितैषी निर्णयकेन्द्र सरकार इस बात पर विचार कर रही है कि आम नागरिक की किसी भी प्रकार की शिकायत को एक आई आर की मान्यता दी जाए। गृह मन्त्रालय राज्य सरकारों के माध्यम से थानों में पंजीकृत होने वाली शिकायतों पर कार्यवाही के सम्बंध में स्पष्ट दिशा-निदेüश देगी कि जनता की शिकायत तकलीफ को गम्भीरता से लिया जाकर उसका निदान किया जाए।केन्द्र सरकार की यह भावना सराहनीय एवं जनहितौषी है। होना भी यही चाहिए कि अत्याचारी दण्डित हो अत्याचार पर अंकुश लगे समाज में सुख-शान्ति का वातावरण निर्मित है। एक-दूसरे में अपनत्व भाईचारा बड़े आदि ईमानदार समाज के लिए इस प्रकार के उपक्रम सार्थक सिद्ध होंगे मगर बेईमान धूर्त समाज इस शा का दुरुपयोग करना शुरू कर दे जो केन्द्र सरकार हर शिकायत को एफ.आई.आर. की मान्यता दे। परन्तु उसके साथ ही यह प्रावधान भी रखे कि अत्याचारी एवं बेईमान धनवली बाहुबली उसका दुरुपयोग कर सच्चे और ईमानदार व्यçक्त पर दुरुपयोग न कर पाए। अगर हम इतिहास में जाकर देखे तब हमारे यहां का पुलिस संगठन की संरचना ब्रिटिश कालीन है। उसके काम करने का ढंग भी ब्रिटिश कालीन अवधारणा पर आधारित है। मसलन कि शिकायत कर्ता को यह सिद्ध करना होगा कि उसकी शिकायत रही है उस पर अत्याचार किया जा रहा है। जबकि व्यवहार में देखा जाए अत्याचारी अपने आपको सीधा-सा बचा ले जाता है या फिर अत्याचारी भी क्रास केस तैयार कर अपने को सुरक्षित कर लेता है।पुलिस विभाग की वृçत्त प्रवृçत्त एवं काम करने का ढंग से सम्भवतज् केन्द्र सरकार सुपरिचित हो। वर्तमान कार्य पद्धति के अनुसार एफ.आई.आर. दर्ज कर लेने का अभिप्रायज् पुलिस विभाग के कुछ कारिन्दों की आमदनी में बढ़ोतरी करना है जो राजकोष में न पहुंचकर निजी कोष में पहुंचती है। आज पुलिस विभाग की कार्यपद्धति स्थिति से हम सभी अच्छी तरह वाकिफ है। वर्तमान परिस्थितियों में किसी प्रकार की कोई सकारात्मक कार्यवाही हो सकती ऐसी संभावना कम है। संभावना तो यह अधिक है कि उल्टी इस व्यवस्था से आम जनता का और अधिक शोषण होने लगेगा।आज स्वतन्त्र हुए 62 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं पर हम लोकतन्त्र के आधारभूत बिन्दुओं को भी अमल नहीं कर पाए। बात तो हम लोकतन्त्र की करते हैं पर व्यवहार में हम सभी सामन्तवादी अवधारणों के उपासक हैं। हमारे प्रत्येक कदम अधिनायकवादी एवं सामन्तवाद की पृष्ठ भूमि पर खड़ा है। लोकतन्त्र का अभिप्रायज् जनता की सरकार जनता के लिए होना है परन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं है। जन प्रतिनिधिय स्वयं को सेवक के तौर पर प्रस्तुत करके चुनाववाद अस्थायी मालिकाना तक प्राप्त कर लेते हैं। यही स्थिति प्रशासनिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों की है वह तो स्वयं को स्थायी मालिक मानकर चलते हैं।कुल मिलाकर केन्द्र सरकार का राज्य सरकार पुलिस की कार्यपद्धति एवं उनके क्रिया-कलापों की बारीकियों को अच्छी तरह जानती है ऐसे में किसी भी शिकायत को एक एफ.आर.आर. की मान्यता मिल जाने से जनता की तकलीफ बढ़ न जाए इस पर यह बात की सरकार को सुनिश्चित करनी होगी।
संपादकीयतौलनी होंगी तैयारियांभारत की राजधानी नई दिल्ली में आगामी वर्ष में राष्ट्रमण्डल खेलों का महाआयोजन होने जा रहा है। हम इस खेल महाकुंभ की मेजबानी करने जा रहे हैं, इसके लिए राजधानी को सजाया जा रहा है संवारा जा रहा है, ताकि विश्व की नज़रों में हमारी अतिथि देवो भव की परपरा अपने सही, स्वरूप में आ सके।यह अलग बात है कि फिलहाल बहुत-सी बातें उठ रही हैं, एक तरफ कहा जा रहा है कि तैयारियों में तेजी की कमी है, यही वजह है कि लगता कि तैयारियां समय पर पूरी हो सकेंगी अथवा नहीं। उधर आयोजन पक्ष का दावा है कि कहीं दूर-दूर तक दिक्कत नहीं है, तैयारियां ठीक चल रही हैं। सब कुछ समय पर हो जाएगा।उधर भारत को वल्र्डकप 2011 के कुछ क्रिकेट मैचों की मेजबानी का मौका भी सामने है। विश्व स्तरीय खेल आयोजनों की मेजबानी का अवसर कितना महत्वपूर्ण होता है यह सर्वविदित है। पर इन सब स्वणिüम संभावनाओं के चलते यदि कुछ ऐसा घट जो जो अप्रिय हो तो संभावनाओं पर साया सा पड़ता दिखने लगता है। कोटला की पिच का श्रीलंका की टीम द्वारा नकार दिया जाना अपने आपमें एक महत्वपूर्ण घटना है गौरतलब है कि यह पिच उसी दिल्ली में है जहां पर खेल महाकुंभ होना है। हालांकि इन दोनों बातों का आपस में सीधा सम्बंध नहीं है, परन्तु क्या इस तरह से अन्तर्राष्ट्रीय पिच का गुणवत्ता से कमतर होना कोई बेहतर संकेत है। पिच के कारण मैच का रद्द हो जाना तीन साल तक के प्रतिबंध का कारण भी बन सकता है। तब इसका 2011 में होने वाले विश्वकप मैचों की मेजबानी पर क्या असर पड़ेगा कल्पना की जा सकती है क्योंकि यहां ग्रुप स्टेज के चार मैच 2011 में होना प्रस्तावित है। अब यह विषय जांच का तो है ही कि आखिर पिच कैसे खराब हो गई, उसकी तैयारी में कहां पर कौन-सी कमजोरी रह गई कि नतीजा यूं सामने ाया। इस मामले में या तो डीडीसीए को मात्र चेतावनी देकर छोड़ा जा सकता है अथवा उस पर जुर्माना भी लग सकता है। इन सबके अतिरिक्त जो अधिकतम दण्ड दिया जा सकता है वह यह कि सेंटर पर तीन वर्ष के लिए प्रतिबंध लग जाए, नतीजा 2011 में मेजबानी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।अब यहां पर चिन्तन का विषय यह है कि आखिर वे क्या परिस्थितियां और कारण है कि जिनके चलते इतनी लापरवाही हो गई कि पिच मैच पूरा होने से पहले ही जवाब दे गई और बॉलर्स द्वारा फेंकी गई बाल्स खतरनाक तरीके से उछलीं, जिससे बल्लेबाज खासे परेशान हो गए। यह तो शुक्र है कि इन उछलती गेन्दों की चपेट में कोई खिलाड़ी नहीं आया अन्यथा तो मामला और गम्भीर हो जाता। हालांकि मैच इस पिच पर 23.भ् ओवर तक चला परन्तु आज जब हमारे यहां खेलों का महाकुंभ होने जा रहा है, 2011 में हमें वल्र्डकप मैचों की मेजबानी करनी है तो क्या यह खामी सामान्य कही जा सकती है।खिलाçड़यों की हमारे यहां क्या हालत है वह समय-समय पर सुर्खियां बयां कर देती है कि फलां चैçपयन ाज यूं अपना भरण पोषण कर रहा है, क्योंकि उसकी कोई पूछ परख करने वाला है ही नहीं। अब कल्पना करें कि यदि इस तरह की लापरवाही या गड़बड़ी फिर हुई तो हमारी छवि कैसी बनेी? क्रिकेट प्रेमी तो इस घटना से खासे निराश हुए ही हैं, खेल जगत ने भी इसके क्या मायने लगाए। होंगे अनुमान लगाया जा सकता है पर जब विश्व स्तरीय आयोजन होंगे और तब कुछ होता है तो परिणामों पर विचार होना जरूरी है। अतज् आज आवश्यकता इस बात की तो है ही कि यह जो कुछ भी हुआ उस पर सही, सटीक कठोर कार्रवाई हो, साथ ही साथ इस तरह की घटनाओं की पुनरावृçत्त न हो इसके लिए हमें हर स्तर पर अपनी तैयारियों को तौलना होगा।
संपादकीयजमू कश्मीर, तमिलनाडु के रास्ते पर झारखण्डअभी हाल में ही झारखण्ड में हुए विधानसभा चुनाव में दोनों ही राष्ट्रीय राजनैतिक पाटिüयों कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने झारखण्ड मुçक्तमोर्चा के नेता और प्रत्याशियों पर आक्रमण पर आक्रमण करके चुनावी समर में अपने-अपने पक्ष में कसीदे पढ़े। परिणामस्वरूप झारखण्ड मुçक्त मोर्चा 18 सीटों पर विजय हासिल करके पहले के मुकाबले अधिक शçक्त के साथ उभरकर आई है। इससे एक सन्देश झारखण्ड के मतदाताओं ने दिया है कि झारखण्ड मुçक्त मोर्चा का जमीनी आधार अन्य राष्ट्रीय राजनैतिक पाटिüयों के समकक्ष ही है। प्रश्न उठता है कि झारखण्ड मुçक्त मोर्चा के नेताओं पर विभिन्न आपराधिक प्रकरण पंजीबद्ध है फिर भी जनता में वे सभी लोकप्रिय है। इसका सीधा-सा जवाब जो हमारी समझ में आ रहा है कि झारखण्ड की जनता अपने मनोविज्ञान को प्रमुखता देती है। उसे बाहर का नहीं अपनी संस्कृति का प्रतिनिधि चाहिए। साथ ही एक कहावत है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती झारखण्ड मुçक्त मोर्चा के प्रतिनिधि अपने मतदाताओं से बेहद सशक्त तरीके से जुड़े हुए हैं। यही बात निदüलीय प्रतिनिधियों एवं कांग्रेस के सहयोगी झारखण्ड विकास मोर्चा ने भी 11 स्थानों पर जीत हासिल की है। इसका सीधा-सा अर्थ है कि झारखण्ड के रीब आदिवासी लोग यह जानते हैं कि उनकी प्राकृतिक संपदा से भरे प्रदेश को अपने ही लोग उपभोग करें। झारखण्डी इसी प्रकृति के कारण स्थिर सरकार नहीं दे पाए।अभी तक के चुनाव परिणामों का विश्लेषण किया जाए तब हम कह सकते हैं कि किसी भी राजनैतिक दल को मतदाताओं ने पूर्ण बहुमत नहीं दिया। झारखण्ड की जनता पर न तो राहुल गांधी का न ही सोनिया गांधी का और न ही भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवाणी का जादू प्रभावित कर पाया है उसने तो अपनी संस्कृति अपनी सोच के अनुसार निर्णय दिया है।चुनाव परिणाम के बाद झारखण्ड मुçक्त मोर्चा भाजपा के साथ जाता है या कांग्रेस के साथ इससे कोई खास अन्तर नहीं पड़ता, हां अन्तर पड़ेगा इस बात पर कि जनता की मूल समस्या के लिए मौन जागरूक रहता है। अभी हाल में भारतीय जनता पार्टी के नेता राजनाथ सिंह और यशवन्त सिन्हा ने स्थानीय जनता की दुखती नब्ज पर हाथ रखकर नई सरकार बनाने के लिए आधार बिन्दु स्थापित किए हैं। झारखण्ड की जनता अपने ादमी से क्षेत्र का विकास चाहती है। कुल मिलाकर झारखण्ड भी जमू-कश्मीर, तमिलनाडु, बिहार, महाराष्ट्र जैसे राज्यों की क्षेत्र में आ गया है जहां राष्ट्रीय दलों को सरकार बनाने के लिए या तो क्षेत्रीय दलों को समर्थन देना पड़ता है। या लेना पड़ता है। भाजपा ने पुरानी सभी बातें भुलाते हुए झामुओ को सरकार बनाने के लिए समर्थन देना निश्चित ही झारखण्ड के विकास का रास्ता साफ किया है और यही समय की मांग है।
संपादकीयसमर्पण से स्थिरता सम्भवझारखण्ड विधानसभा केचुनाव आदेश परिणाम ने प्रदेश की राजनैतिक अस्थिरता को बनाए रखने का संकेत देकर यह बतलाए जाने का संकेत दिया है कि राजनीतिक दलों के नाम कितने भी रख लो सबके सबके सब एक समान है कोई नागनाथ है तो कोई सांपनाथ है। सबके सब जनता की मेहनत की कमाई का उपभोग कर जनसेवक कहलाते हैं। किसी में कोई अन्तर नहीं दिखलाई देता है। एक भी पार्टी में वास्तविक जनप्रतिनिधि नहीं है अगर किसी पार्टी में जनता के प्रति समर्पित व्यçक्त हो तो तब निश्चित ही उन्हें विधानसभा में भेजा जाता औरयदि नकारात्मक वोट की व्यवस्था होती तब निश्चिततौर पर झारखण्ड की जनता अपने विचारों की अभिव्यçक्त नकारात्मक वोट देकर झारखण्ड विधानसभा के वर्तमान परिणाम त्रिशंकु सरकार बनाने के लिए भी इजाजत नहीं देती है। ईमानदारी वाली बात तो यह है कि चुनाव पूर्व जिन-जिन पाटिüयों ने गठबंधन करके चुनाव लड़ा था। उनमें से एक के भी पास बहुमत नहीं है। ऐसी स्थिति में अगर कोई संगठन या पार्टी समर्थन देता है। तब वह जनता द्वारा दिया गया आदेश का उल्लंघन करने की श्रेणी में आएगा।कांग्रेस और भाजपा दोनों ही राष्ट्रीय पाटिüयां बहुमत से दूर है। पिछले चुनाव को आधार मानकर यदि विचार करें तब कांग्रेस की ताकत बढ़ी है और भाजपा से जनता ने मुंह मोड़ लिया है। दोनों ही राष्ट्रीय पाटियां क्षेत्रीय पाटिüयों को नुकसान नहीं पहुंचा पाई है बल्कि क्षेत्रीय पाटिüयों के भाव बढ़ गए हैं। सौदेबाजी के नए-नए आयाम खुले हैं। बोली भी ऊंची होने की संभावना है।झारखण्ड के प्रथम मुयमन्त्री बाबूलाल मराण्डी की शçक्त बढ़ी है। मराण्डी की नई पार्टी झारखण्ड विकास पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था पर बहुमत में पीछे रह गए।झारखण्ड की बात करते समय झारखण्ड मुक्त मोर्चा के नेता शिबू सोरेन को नकारा नहीं जा सकता अबकी बार वह अच्छी साहूकारी स्थिति में है। झारखण्ड की जनता ने क्षेत्रीय पाटिüयों को पूरा समर्थन देते हुए चेतावनी दी है कि अभी भी वक्त है सुधर जाओ अकेले अपने बूते पर सरकार बनाने के लिए जनता में घुसना पड़ेगा, काम करना पड़ेगा। तभी झारखण्ड के मतदाता तुमको परखने का अवसर देंगे।प्राकृतिक सपदा से भरपूर झारखण्ड राज्य सरकार बनाने के लिए आदिवासी मुयमन्त्री चाहता है चाहे वह मराण्डी हो या शिबू सोरेन हो बिना इनके समर्थन के कुछ ही हासिल नहीं हो सकता। अब प्रश्न यह उठता है कि यूपीए इसको मूर्तरूप कैसे दे। बले ही शिबू सोरेन को कांग्रेस ने बहलाना-फुसलाना शुरू कर दिया है। कांग्रेस का मुयमन्त्री बनवाने के बदले में केन्द्र में मन्त्री पद देने का प्रस्ताव मानने को कह रहे हैं। मगर पता चला है कि यह प्रस्ताव शिबू सोरेन मंजूर नहीं है। कांग्रेसी मैनेजरों की निगाह राज्य के माइन्स मिनरल पर है।अभी तक के प्रयासों में झारखण्ड में सरकार बनाना इतना आसान नहीं है। ऐसे वातावरण में इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि पाटिüयों के कुछ मैनेजर खरीद-फरोत के द्वारा सरकार बनाने में लगे हुए हो। नई सरकार के लिए राज्यपाल की जिमेदारी महत्वपूर्ण है। लगता है कि भारतीय जनता पार्टी ने इस स्थिति का आकलन करलिया है तभी तो यशवन्त सिन्हा ने कहा है कि भाजपा को सरकार नहीं बनानी चाहिए। यशवन्त सिन्हा का वक्तव्य इस बात का संकेत दे रहा है कि चुनाव बाद नया गठबंधन ऐसा बनेगा जिससे सब कुछ अच्छा नहीं होगा। शिबू सोरेन ने चुनाव पूर्व कांग्रेस से समझौता नहीं किया इसलिए आज वह स्वतन्त्र है। वह कांग्रेस भाजपा में से किसी से भी हाथ मिलाकर सत्ता के लड्डू गपक सकते हैं। कांग्रेस के साथ मराण्डी है। मराण्डी और शिबू सोरेन में आदिवासी नेतृत्व की जंग जगजाहिर है। झारखण्ड में स्थिति विकट और गम्भीर है इसलिए राज्यपाल की भूमिका अधिक महत्व रखती है।झारखण्ड में लालू प्रसाद के छह विधायकों का अपना महत्व है। सपूर्ण गठित लगाने, और खरीद फरोत के बाद कहीं निदüलीय मधुकोड़ा का इतिहास दोहरा न जाए। यह स्थिति राज्य के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती है। चुनाव पूर्व गठबंधन पर एक नज़र डाले तब कांग्रेस के साथ बाबूलाल मराण्डी जो हिन्दू आधारित संस्कृतिक स्वभाव के हैं कैसे साथ रह सकते हैं? इसी प्रकार भारतीय जनता पार्टी के साथ जनता दल यू जो मूलरूप से हिन्दूवादी विचारधारा के विरोधी हैं। किसी भी प्रकारसे सत्ता की खातिर सरकार बन भी गई तब उसकी उम्र कितनी होगी यह भी विचारणीय होना चाहिए।कुल मिलाकर मतदाता राजनीतिज्ञों, राजनीतिक पाटिüयों और उनके मैनेजरों के कपड़े उतारकर उन्हें बेनकाब करना चाहती है ताकि राष्ट्रीय पाटिüयों की मनोदशा उनके थोथे वायदे और मतदाता के प्रति समर्पण उजागर हो सके। झारखण्ड की आदिवासी जनता राजनीतिक शोषकों को यह सबक सिखलाना चाहती है कि अभी तक हमारी सपçत्त को लूटकर बड़े आदमी बनते रहे और हमको गरीबी में ढकेलते रहे यह नहीं चल पाएगा। नेताओं समाज और देश के प्रति समर्पण करना सीखो उस स्थिति में ही राजनैतिक स्थिरता सम्भव हो सके।
संपादकीय...गरीब के बनेगी शराबमहात्मा गांधी ने सच ही कहा था कि हमारी धरती मां के पास इतना तो है कि वह अपने आçश्रतों को पेट भरकर भोजन दे सकती है परन्तु देश के एक लालची व्यçक्त की इच्छापूर्ति नहीं कर सकती है। क्योंकि लालची व्यçक्त को कभी-भी कोई भी सन्तुष्ट नहीं कर सकता। भारत मां परिश्रमी को सुबह भूखा उठाती है पर रात को कुछ न कुछ खिलाकर ही सुलाती है। ऐसी कृपालु धरती मां के कलयुगी सपूतों ने निजी हितों को संरक्षित रखने के लिए क्या-क्या करतब किए हैं उनकी फेहरिस्त काफी लबी है। अभी हाल में ही गरीबी का आकलन करने वाली सुरेश तेन्दुलकर समिति की रिपोर्ट में बताया गया है कि देश के 6 राज्य गरीबी से त्रस्त हैं उनमें महाराष्ट्र राज्य भी है उसी गरीब राज्य की सरकार जो अपने प्रदेशवासियों को रोटी नहीं दे सकती कर्ज माफ नहीं कर सकती, अपने सपूतों को आत्महत्याएं करने से रोक नहीं सकतीं, वही सरकार गरीबों के मोटे अनाज से शराब बनाने की इजाजत देकर उन गरीबों को भूखों मरने के लिए मजबूर कर रही है। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में रहने वाले किसानों की स्थिति का उसे याल नहीं आता जहां भूख से छुटकारा पाने के लिए आत्महत्या कर रहे हैं।महाराष्ट्र सरकार भूखों को अन्न की व्यवस्था तो कर नहीं पाई उल्टे मोटे अनाज से ज्यादा से ज्यादा लोगों को शराब उपलब्ध करवाने के लिए उद्योगपतियों को लाइसेंस दे रही है। उसने 40 करोड़ के पूंजी निवेश की उमीद के साथ राज्य में 23 शराब कारखानों को 60 हजार लीटर से लेकर सवा लाख लीटर प्रतिदिन शराब बनाने की अनुमति देकर प्रदेश के उन उद्योगपतियों को 10 रुपए प्रति लीटर सçब्सडी भी देने का निर्णय लिया जो कम कीमत पर छोटी थैलियों में शराब बेचने की सुविधा गली-कूचों में उपलब्ध कराएगी। महाराष्ट्र सरकार की सोच के सम्बंध में यह बानगी ही होगी कि महाराष्ट्र का किसान ज्वार, बाजरा और मक्का ही पैदावार के लिए इससे प्रोत्साहित होगा। इन फसलों से अभी तक वह सोयाबीन उगाता आ रहा है। किसान की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। महाराष्ट्र में पहले से ही शराब उत्पादन के क्षेत्र में 2भ् कारखाने चल रहे हैं। 18 नई भटि्टयों को स्थापित करने की इजाजत अभी और दी गई है। ज्ञात हो कि महाराष्ट्र में शराब की ज्यादातर भटि्टयां कांग्रेस भाजपा और एनसीपी नेताओं की ही है। जिनमें पूर्व प्रधानमन्त्री नरसिहाराव पूर्व मुयमन्त्री बिलासराव देशमुख भाजपा नेता गोपीनाथ मुण्डे महाराष्ट्र के आबकारी मन्त्री गणेश नाइक के परिवारजन रिश्तेदार आदि द्वारा संचालित है। महाराष्ट्र में सबसे अधिक शराब अंगूर से बनाई जाती रही है मगर जिस तेजी से नई-नई भटि्टयों को खोला जा रहा है उससे अंगूर की उपलब्धता में कमी आ रही है। महाराष्ट्र में अंगूर सुखाकर किसमिस बनाने का भी बड़ा कारोबार होता है। इसलिए महाराष्ट्र सरकार ने मोटे अनाजों से शराब बनाने के लाइसेंस जारी किये हैं।महाराष्ट्र में गरीबी का जहां तक सवाल है यहां पर देशभर से लोगों का आना जाना लगा रहता है। महाराष्ट्र में देशभर के मजदूर भारी संया में रोटी कमाने के लिए जाते हैं। परन्तु महंगाई की मार से त्रस्त दो जून की रोटी कमाने के लिए उन्हें लाले पड़ रहे हैं। ऐसे में गरीब जैसे-तैसे मोटा अनाज खाकर अपना गुजर बसर कर लेता है। परन्तु अब स्थिति यह आ रही है कि शराब लॉबी के खाद में मोटे अनाज को भी शराब बनाने के काम में लेकर मोटा अनाज से गरीब से मेहरूम किया जा रहा है।महाराष्ट्र सरकार पर शक्कर लॉबी किस प्रकार से हाबी है। उसी प्रकार से शराब लॉबी भी कम नहीं है। देश में शक्कर के भाव तीन गुने बढ़ गए हैं इसी प्रकार से आने वाले समय में मोटे अनाजों के भाव आसमान पर पहुंच जाने की पूरी संभावना दिखाई दे रही है।शिवसेना सहित अन्य राजनैतिक दल शराब के लाइसेंस दिये जाने, मोटे अनाज से शराब बनाने शराब पर सçब्सडी देने का विरोध नहीं कर रहे हैं, क्योंकि अधिकांश पार्टी के लोग इन गोरख धंधों में स्वयं को फंसाए हुए हैं। उन सभी के हित संरक्षित हो रहे हैं। गरीब जनता का ध्यान भटकाने के लिए महाराष्ट्रवाद, भाषावाद के शगूफे छोड़ते रहते हैं। वास्तविकता यह है कि राजनीति में सभी पाटिüयां अपने-अपने हितों को संरक्षित करने में चौकस हैं। उन्होंने तो गरीबों को निबाले भी खाने को नहीं छोड़े।
संपादकीयमतदान की अनिवार्यता?गुजरात विधानसभा के शीतकालीन सत्र के अन्तिम दिन स्थानीय निकाय कानून संशोधन विधेयक 2009 को मंजूरी देकर देश में पहली बार मतदान को अनिवार्य करने और मतदाताओं को नकारात्मक वोटिंग का अधिकार कर देश को एक दिशा दी है।भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में गुजरात विधानसभा ने अनूठा और साहसिक कदम उठाकर यह सन्देश दिया है कि लोकतन्त्र को पुष्ट करने, उसे कारगर बनाने और भारतीय जनता को महत्व देने का चिन्तन गुजरात के राजनेताओं में है। वह केवल स्वार्थ और वोट की राजनीति तक ही सीमित नहीं है। मताधिकार की अनिवार्यता और नकारात्मक मतदान दोनों ही ऐसे श हैं जिनसे आजके राजनेताओं की जमीन सरकने लगेगी। आज नेता कैसे बनता है और उसका बजूद क्या है इससे हर कोई जानकार है पर जब मतदान अनिवार्य करदिया जाएगा उस समय मतदाता को मत देना जरूरी हो जाएगा। अन्यथा डिफाल्टर घोषित हो जाएगा। डिफाल्टर मतदाता कोकुछ अधिकारों से वंचित होना पड़ सकता है। शनैज्-शनैज् मताधिकार के सम्बंध में जागरूकता बढ़ेगी। शिक्षा के विकासके साथ मताधिकार का उपयोग निश्चित तौर पर एक क्रान्ति ला देगा। गुजरात राज्य ने देश की सकारात्मक और लोकतन्त्र को मजबूत करने में अपनी ्हम भूमिका का निर्वहन करके यह बतला दिया है कि गुजरात गांधी का प्रदेश है।हम समझते हैं कि गुजरात की देखा देखी अन्य राज्य भी अनुशरण करेंगे और देर सवेर विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में भी यह लागू हो जाएगा।इस प्रश्न पर राष्ट्रीय राजनैतिक दलों को राष्ट्रीय परिपेक्ष में विचार करने की जरूरत है। आज की राजनैतिक अस्थिरता को समाप्त करने का इससे अच्छा और कोई मार्ग नहीं हो सकता।सभी राजनैतिक दल समर्पित प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारेंगे। अवसर वादिता पर अंकुश लगेगा। कुल मिलाकर इसका दूरगामी असर पड़ेगा।
संपादकीयपर्यावरण व्यçक्तगत दायित्वपर्यावरण समेलन का आयोजन और उसके नतीजों से विश्व के समस्त देश वाकिफ हो चुके होंगे। पर्यावरण समेलन का हेतु ही स्वार्थ पर आदारित हो तब उसके परिणाम भी ईमानदार नहीं निकल सकते। पर्यावरण का बदलाव केवल विकासशील देशों को ही प्रभावित नहीं करेगा उसका प्रभाव तो समूची दुनिया पर पड़ रहा है और पड़ेगा। आज विकसित देशों की यह धारणा कि विकासशील देशों पर दबाव बढ़ाकर समझौते करवा लिए जाएं और स्वयं जिस ढरेü पर चल रहे हैं वैसेही चलते रहें। अब यह सम्भव नहीं है। ठीक है पर्यापरण परिवर्तन की मार हमारे ऊपर भी पड़ रही है। हम भी उसे झेल रहे हैं पर विकसित देशों की स्थिति तो ऐसी है कि वह प्राकृतिक परिवर्तन को झेलने की स्थिति में भी नहीं है पिछले कुछ दिनों से हो रही वर्षवारी ने पाश्चात्य देश संकट में आ गए हैं। प्राकृतिक परिवर्तन ने जन जीवन अस्त व्यस्त कर रखा है। अगर अभी भी विकसित देशों ने अपने रवैये में परिवर्तन नहीं किया तब उनको भी गम्भीर स्थितियों से दो चार होना पड़ेगा। जहां तक सवाल उठता है भारत का उसमें तो सहनशीलता और परिस्थितियों को अनुकूल बनाने की अतिरिक्त क्षमता है। भयंकर मन्दी के समय में भी भारत अडिग अटल खड़ा रहे। प्राकृतिक परिवर्तनों को झेलने में उसे तकलीफ नहीं होगी।साधारण-सी बात है कि पर्यावलरण पर नियन्त्रण का जिमा जनता पर है। आम आदमी को पर्यावरण को सन्तुलन देने के लिए शिक्षित करना पड़ेगा और उसे प्रोत्साहित करना पड़ेगा। कोपेन हेगन में लगभग एक पखवाड़े तक चलने वाले समेलन के परिणाम अप्रत्याशित नहीं कहे जा सकते। यह समेलन विकसित देशों की कूटनीतिक चाल थी कि किस प्रकार विकासशील देशों से अपने हितों के अनुरूप समझौते पर हस्ताक्षर करवा लिए जाएं। विकसित देश हर क्षेत्र में अपनी दादागिरी की अंजाम देना अपना अधिकार मानकर चल रहे हैं पर अब वक्त बदल रहा है। विकासशील और विकसित देशों के मध्य काबüन उत्सर्जन में कटौती का मुद्दा तो समेलन शुरू होते ही असहमति के आगोश में तड़पने लगा था भला हो अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा का उन्होंने विकासशील देशों की भावना को समय रहते पढ़ लिया और थोड़ी समझदारी दिखाई जिसकी वजह से दो बिन्दुओं पर सहमति बन सकी। एक तो पृथ्वी का तापमान 2 डिग्री सेçल्सयस से अधिक नहीं बढ़ने दिया जाए। इसका विकासशील देश विकसित देशों को आर्थिक मदद करते रहेंगे। इस सहमति का आज के दिन कोई महत्व नहीं दिखलाई दे रहा है। फिर भी हम आशावादी हैं। भारत ने स्पष्ट करदिया कि हमें गरीबी की कीमत पर पर्यावरण का संरक्षण नहीं करना है, क्योंकि कोपेनहेगन में जितने भी प्रतिनिधि उपस्थित थे वे समस्त अपने-अपने देश के हितों को संरक्षित करने के प्रति सजगता बता रहे थे न कि पर्यावरण में काबüन उत्सर्जन में कटौती के प्रति गम्भीर थे। कुल मिलाकर अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी पर्यावरण के मुद्दे पर समेलन करती रहे हम सब नागरिकों का कत्तüव्य है कि हम अपने आसपास के वातावरण को शुद्ध रखने का पूरा प्रयास कर अपनी सन्तति को स्वस्थ बनाए रखने में योगदान देकर अपने कत्तüव्य का निर्वहन करे।

22 दिसम्बर, मंगलवार,09संपादकीय-1समझना होगा कार्यकर्ता का ददüभारतीय जनता पार्टी के इतिहास में 18-19 दिसम्बर 200भ् का दिन महत्वपूर्ण दिन होगा, क्योंकि भारतीय जनता पार्टी ने भी कांग्रेस पार्टी की तरह संसदीय दल के अध्य7 का पद निर्मित कर लिया है और लोकसभा में विपक्ष के नेता से त्यागपत्र देने वाले लालकृष्ण को उस पर सुशोभित कर सम्भवतज् तुष्टीकरण की नीति अपनाई है।इस व्यवस्था से सांसद आडवाणी के कद में इजाफा हुआ है या पिर गिरावट आई है यह अलग बात है, परन्तु भारतीय जनता पार्टी के संविधान में संशोधन कर बनाए गए नये पद पर विराजे व्यçक्त कोसंसद एवं राज्यसभा के दल नेता नियुक्त करने तक का अधिकार मिलता निश्चित रूपसे बढ़े हुएकद को दर्शाता है।नये संसदीय दल के अध्यक्ष पद का निर्माण संघ की विचारधारा से मेल खाता है या नहीं यह अलग बात है पर इतना तो निश्चित ही कहा जा सकता है कि इस व्यवस्था से भारतीय जनता पार्टी का समग्र आन्तरिक सुधार सम्भव नहीं है।भाजपा भयावह संकटों और अन्तर्कलह से घिरी पार्टी में यदि नेतृत्व अपने को प्रमुखता दे तब कैसे माने कि भारतीय जनता पार्टी के अखिल भारतीय नये अध्यक्ष नितिन गडकरी ऐसा कुछ कर पाएंगे जो भारतीय राजनीति को नई दिशा देखने में कामयाब हो सके। संगठन का कायाकल्प समर्पण से होता है। भाजपा तो संस्कारित पार्टी हैं। मां,पिता, गुरु, पति-पत्नी, लड़का-लड़की आदि के समर्पण ही परिवार की एकता की शçक्त को अनुभव कराते हैं। पिछले लगभग भ् माह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के मन्थन के जो परिणाम सामने आ रहे हैं वह भारतीय जनता पार्टी के वास्तविक संकटों का निदान नहीं कर पाएंगे। जब तक भाजपा नये सिरे से आम जनता में यह सन्देश नहीं बिखेरती कि भारतीय जनता पार्ट नेताओं की पार्टी नहीं है आम जनता के दुख ददü को मुखरित करके निदान करने वाली पार्टी है। नितिन गडडकरी पहले दिन से ही आम आदमी में पार्टी के प्रति विश्वास त्याग और समर्पण का जनजागरण कर पार्टी के प्रति विश्वास त्याग और समर्पण का जन जागरण कर पार्टी को पूर्ववत खड़ा करने को प्राथमिकता दे न कि पुराने लोगों से आशीर्वाद लेने में लगे रहे।भारतीय जनता पार्टी के नये अ.भा. अध्यक्ष गडकरी की आस्था आम कार्यकर्ता और पार्टी की नीतियों में होनी चाहिए न कि नेताओं की तुष्टीकरण में। राज्यसभा लोकसभा पर गडडकरी का कितना प्रभाव रहेगा। ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब आम कार्यकर्ता जानना चाहता है कोई भी व्यçक्त हो पार्टी से बड़ा नहीं हो सकता। जहां नेता बड़ा होने की बात सोचता है वहीं पर पार्टी का मार्ग गर्त की ओर मुड़ने लग जाता है। इस पर विचार किया जाना चाहिए। गडकरी की सोच में पुराने समर्पित लोगों को साथ रखने का जो विचार आया है वह सकारात्मक है।
संपादकीय-2महंगाई ने उलझन बढ़ाईशीतकालीन अधिवेशन में संप्रग के निति निर्धारक नेता अपनी रणनीति में सफल ही नहीं रहे बल्कि भारतीय जनता के सामने विपक्ष की नकारता को ढोल धमाके के साथ उजागर कर दिया। सांसद तो मात्र सुविधाओं को भूखे हैं जनता की परेशानियां उन तक पहुंच ही नहीं पाती। विपक्ष को महंगाई का मुद्दा सबसे उपयुक्त लगता है। इस पर बहस भी होती है पर निर्णय कुछ भी हाथ नहीं आता। सरकार की निçष्क्रयता के कारण आवश्यक वस्तुओं के भाव अक्टूबर के मुकाबले तीन गुना बढ़ गये हैं। वित्तमन्त्री महंगाई बढ़ने से चिन्ता व्यक्त करने की रस्म अदायगी कर रहे हैं। खाद्य पदाथोZ की महंगाई दर नवबर के अन्तिम सप्ताह में 19.04 प्रतिशत भी पिछले 8 माह में आलू 141 प्रतिशत चीनी 37 प्रतिशत दालें, 32 प्रतिशत प्याज, 20 प्रतिशत बढ़े हैं। प्रधानमत्री की आर्थिक सलाह परिषद के अध्यक्ष सुरेश तेन्दुलकर ने कहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक महंगाई पर काबू पाने के लिए नकदी खींच सकता है तथा अगले महीने क्रेडिट पॉलिसी पुनरीक्षित की जा सकती है। थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर नवबर में सबसे ज्यादा 7.78 फीसदी हो गई। पिछले साल इसी महीने में 1.34 प्रतिशत थी। वित्तमन्त्री प्रणब मुखर्जी और वाणिज्यमन्त्री आनन्द शर्मा भी महंगाई बढ़ोत्तरी से चिन्तित हैं। अर्थशाी इन्द्रनील पान का कहना है कि खाद्य और कामोडिटी के दाम बढ़ने का सीदा असर जनता पर पड़ रहा है उनका कहना है कि अगले वर्ष मार्च तक थोक मूल्य सूंचकांक आधारित महंगाई पर 8-7 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। केन्द्रीय बैंकको सिस्टम में मौजूदा ज्यादा नकदी को कम करने के लिए कदम उठाने होंगे। रिजर्व बैंक जनवरी में कैश रिजर्व राशियों में 2भ्-भ्0 बेसिस पाइंट की कमी कर महंगाई के खिलाफ कदम उठा सकता है। इस समय खाद्य पदाथोZ की महंगाई आसमान छू रही है। थोक मूल्य सूचकांक में इसका वेटेज 14.4 प्रतिशत है। कुल मिलाकर केन्द्र सरकार महंगाई को नियन्त्रित करने में स्वयं को असक्षम मान रही है। वह राज्यों से अपेक्षा कर रही है कि वह कारगर कार्यवाही करें।

अच्छी पहलभारतीय लोकतन्त्रका
आधारभूत ट्रेक अब पहली बार पकड़ में आता दिखलाई दे रहा है। प्रश्न उठता है कि 1भ् अगस्त 1947 को देश को स्वतन्त्र करवाते समय आम जनता के मन में जो सपना जगाया गया था। उसको कार्यरूप में परिणित करने का आंशिक प्रयास गुजरात की सत्तारूढ़ पार्टी ने प्रारंभ किया है। देश के इतिहास में यह प्रथम अवसर है जब गुजरात विधानसभा ने मताधिकार को अनिवार्यता के दायरे में लाने का विचार बनाया फिलहाल वह राज्य के स्थानीय निकायों को गुजरात स्थानीय प्राधिकार (संशोधन) विधेयक 200भ् राज्य विधान सभा में प्रस्तुत किया जाएगा।अगर यह विधेयक पारित हो जाता है तब निश्चित तौर पर भारतीय लोकतन्त्र में सकारात्मक सुधार दिकाई देने लगेगा और लोकतन्त्र की आदारभूत कल्पना साकार होती दिखाई देने लगेगी। लोकतन्त्र का आधार ही लोकमत के अनुसार देश का संचालन करना है। कुल मिलाकर लोकतन्त्र की भावना के अनुरूप अब भारतीय जनता पार्टी की गुजरात सरकार ने देशवासियों का ध्यान आकर्षित है कि लोकतन्त्र के लिए कौन पार्टी बेईमान स्वार्थी है और कौन-सा राजनैतिक दल ईमानदार सोच रखता है। आज स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं में मताधिकार को आवश्यक किये जाने का विधेयक लाया जाएगा तो कल विधानसभा और लोकसभा में भी ऐसा विधेयक लाना ही पड़ेगा जब देश में सभी जगह मताधिकार आवश्यक हो जाएगा उस दिन देश में वास्तविक लोकतन्त्र का राज शुरू होगा।
संपादकीयबढ़ती महंगाई तपनडा. मनमोहन सिंह को भगवान का शुक्र अदा करना चाहिए कि वह भारत के प्रधानमन्त्री हैं कल्पना कीजिए अगर वह अमेरिका के राष्ट्रपति होते और महंगाई को बढ़ाने में मदद करते या यूं कहें कि मनमोहनी अर्थशाीय सिद्धान्त को अमेरिकी जनता पर लागू करते तब परिणाम क्या करतब दिखलाते इसकी डा. मनमोहन सिंह ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। डा. मनमोहन सिंहको स्मरण रखना चाहिए कि वह भारत के प्रधानमन्त्री हैं और भारतीय जनता संस्कारित, सहनशील, राजा (प्रधानमन्त्री) को भगवान मानती हैं। इसलिए अभी तक वह सब कुछ बदाüस्त करती रही है। जनता आशावादी हैं। महंगाई नियन्त्रित होगी ऐसा उसे विश्वास था, परन्तु प्रधानमन्त्री से होकर कृषि मन्त्री ने महंगाई नियन्त्रण के बजाय महंगाई बढ़ाने को क्लीन चटि देतेसमय उपभोगवादी प्रवृçत्त को प्रोत्साहन दिया जिसकी बजह से महंगाई ने तेज रतार अçतयार कर पूंजीपतियों को खुल्ला छोड़ दिया।अर्थशा के सिद्धान्त के तहत मन्दी और महंगाई गाड़ी के दो पहिए होते हैं इनका अपना गूढ़ सिद्धान्त हैं जो सामान्यतज् आम व्यçक्त की समझ से परे हैं। दोनों पहियों की गति देश को विकास पथ पर अग्रसर करती है। मन्दी में सब चीजों के दाम गिरते हैं। तब विकास दर बढ़ती है तब महंगाई घटती क्यों नहीं। चारों तरफ महंगाई से आम आदमी पस्त है। अर्थशा कुछ भी दिखलाए पर राजनीति शा तो यही दर्शा रहा है। महंगाई को बदाüश्त करो चिल्लाओ नहीं सब कुछ बदाüश्त करते रहो इसी विश्वा के रहते भारतीय सरकार निश्चिन्तता से अपनी राजनीति को परवान चढ़ाकर एकके बाद एक राज्य कब्जाती जा रही आत्मविश्वास से सरावोर कांग्रेस पार्टी ने आम आदमी पर महंगाई के चाबूकों की मार पर मार बढ़ाकर दासता के उन काले पन्नों के इतिहास को पीछे छोड़ दिया जिसे याद कर आत्मा सिहर जाती है।भारतीय जनता की सहनशीलता ने जवाब दे दिया उसने हेडली, मुबई हमला, आतंकवाद,लिब्रहान रिपोर्ट रेड अलर्ट, हाई अलर्ट बाबरी मçस्जद 1984 की घटना कोड़ा भ्रष्टाचार ब्रहणेश्र वार्म आदि अनेकों कांग्रेसी परोसो को एक तरफ सरका कर महंगाई के मुद्दे को संसद भवन में खड़ा कर दिया है। अब भारतीय जनता के प्रतिनिधि महंगाई का समाधान सुनना चाहते हैं। सपूर्ण विपक्ष महंगाई का समाधान सुनना चाहते हैं। सपूर्ण निपक्ष महंगाई से त्रस्त जनता का प्रतिनिधित्व करने में संसद भवन में खड़े हो गए हैं, अच्छी बात है चारों तरफ फैले हाराकार ने संसद सदस्यों के कान खड़े कर दिए हैं सरकारी संरक्षण ने भ्रष्टाचारियों जमाखोरों को सुनहरा मौका दिया उन्होंने भरपूर फायदा उठाया परन्तु अब जनप्रतिनिधियों ने अभी तक की पूरी कोर कसर निकालकर सरकार के होश फाते करने की पूरी तैयारी कर ली है। देखना यह है सरकार अब और कौन सा पैन्तरा खेलती है और विपक्ष को और कौनसा मुद्दा परोसती है जो महंगाई से सांसदों को भटका दें। कांग्रेस का इतिहास बताता है कि जब-जब वह सत्ता में आई महंगाई पर चढ़कर ही आई कांग्रेस का आने का मतलब महंगाई की आमन्त्रित करना? इस बार ऊंट किस करवट बैठेगा यह देखने की बात है।
संपादकीयकिसी भी देश की तरक्की ही नहीं बल्कि उस देश के नागरिक और उनका समाज भी तभी प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़कर नई ऊंचाइयां छू सकता है जहां पर लोकतन्त्र की बयार बहती हो। इस मामले में भारत के सभी नागरिक खुशकिस्मत हैं कि यहां पर कभी-भी किसी-भी व्यçक्त ने देश को अपनी मर्जी से चलाने की कोशिश नहीं की बल्कि उन्होंने देश को जनता के मतानुसार ही चलाया है और संसद भवन से लेकर विधानसभा तथा स्थानीय सरकार (नगर पालिक निगम) तक का गठन जनता के मतों पर ही आज तक निर्भर रहा है। आज मध्यप्रदेश के ग्वालियर शहर में भी नई स्थानीय सरकार के गठन हेतु गत दिनों हुए मतदान की गणना (आपके हाथों में जब अखबार होगा तो परिणाम भी सामने आ चुके होंगे) चल रही है । इसके परिणाम के बाद स्थानीय सरकार की गठन की कवायद भी शुरू होगी और हर दल यह प्रयास करेगा कि स्थानीय सरकार उनकी ही बने या फिर गठित होने वाली सरकार उनका सहयोग ले, उनके सहयोग के बिना कोई सरकार अपने अस्तित्व में न आ पाए। यह तो एक तस्वीर है लोकतन्त्र के एक पहलू की। लोकतन्त्र यह भी कहता है कि हमें संविधान में प्रदत्त सारी सुविधाएं और अधिकार मिलें। इसके प्रयास होते रहे हैं, लेकिन ग्वालियर में लोकतन्त्र के लिए लोकतन्त्र का ही उपहास उड़ाया गया। यह उसकी सेहत के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता है। उपहास इस मायने में कि हमें मतगणना के लिए सुरक्षा के चलते ऐसे उपाय और ऐसे स्थान का चयन करना पड़ा जहां पर मत देने वालों को भारी तकलीफों का सामना करना पड़ा। स्थानीय यातायात का साधन टूसीटर जिसका क्रमांक एमपी 07टी 1613 में सवार एक पेसेंट को सिर्फ इसलिए उस रास्ते का इस्तेमाल नहीं करने दिया गया कि आगे मतगणना का कार्य लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के लिए चल रहा था। इस मामले में महारानी लक्ष्मीबाई कॉलेज
डीकेवी14 दिसम्बर, सोमवार, 09संपादकीयक्यों भूल गए कुबाüनीभारत के इतिहास में 13 दिसम्बर 2001 का दिन काले दिनके रूप में जाना जा रहा है। इस दिन आतंकवादियों ने हमारेलोकतन्त्र के मन्दिर पर हमला करके उसकी सुरक्षा पर एक प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया। वह आजभी उसी तरीके से देश की जनता, सरकार, जनप्रतिनिधियों से प्रश्न पूछ रहा हैकि क्यासीख ली तुमने? ाज भी हम उसी स्थिति में बैठे-बैठ केवल बतियाते रहते हैं कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं है।शर्म से सिर नीचे तब हो गया जब 13 दिसम्बर 2009 को 8वीं बरसी पर मात्र 11 सांसद उपस्थित हुए। लगताहै हमारे जनप्रतिनिधियों की संवेदनाएं कुंठित हो चुकी हैं। लोकतन्त्र के मन्दिर पर आतंकी हमले की बरसी पर शहीदों को हम श्रद्धांजलि देने के लिए संसद भवन भी नहीं पहुंच सकते। हम कितने ात्म केन्दि्रत होते चले जारहे हैं। चूंकि 13 दिसम्बर को रविवार था इसलिए अधिकांश सांसद अपने-अपने गृह क्षेत्रों में या पिर दिल्ली में ही उपस्थित रहकर भी देश के लिए बलिदान होने वाले शहीदों को अपने क्षेत्रकी जनता की तरफ से श्रद्धासुमन तक समर्पित करना जरूरी नहीं समझा। इस प्रवृçत्त को क्या संबोधन दिया जाना चाहिए इसे जनता और जन प्रतिनिधि स्वंय तय करे। बेशर्मी की भी एक सीमा होती है। हम उस सभी सांसदों से प्रश्न करना चाहेंगे कि उन्हें इस बात की निश्चित तौर से जानकारी होगी फिर ऐसा किस प्रहन्ति के वशीभूत उन्होंने किया। उस शहीद नानकचन्द्र जिसने अपने जान की बाजी लगाकर आतंकियों को संसद भवन में प्रवेश नहीं करने दिया उसकी शहादत को हमारे सांसदों ने यह सिला दिया। शहीद नानक चनू की पत्नी गंगा देवी तो अपने बच्चों को बड़े गर्व से कहती हैं कि उनके पिता ने संसद की रक्षा करते अपने प्राण न्यौछावर किए तुम उस बात के रक्त के अंश हो जिसने अपनेफर्ज के खातिर बलिदान कर इतिहास में अपना नाम लिखाया। आज वहीं बच्चे सांसदों से प्रश्न करते हैं कि 13 दिसम्बर 2001 के दिन उपस्थित सांसदों का रक्षा कवच बनने वाले उसके पिता को मारने वालों सूत्रधार अफजल गुरु क्यों बचे हुए हैं।एक तरफ गंगादेवी उसके बच्चे, और शहीदों के परिवार वाले अफजल को फांसी का इन्तजार कर रहे हैं दूसरी तरफ अफजल के समर्थक और विरोधियों के मध्य एक लड़ाई लड़ी जा रही है जिसे पारदर्शिता का नाम दिया जा रहा है या हम लोकतान्त्रिक की उस व्यवस्था को पुष्ट कर रहे हैं जो हमको बुजदिल बना रही है।हैग अफजल गुरु नाम से चालू ऑन लाइन याचिका पर अभी तक सैकड़ों लोगों ने फांसी दिए जाने का समर्थन किया है पर 20 अक्टूबर 2006 को अफजल की फांसी की तारीफ निश्चित होने के बाद भी आज दिनांक तक कुछ नहीं हुआ। अफजल की पत्नी तबस्सुम और मां आयशाने राष्ट्रपति के पास एक क्षमादान याचिका दाखिल कर दी। प्रश्न उठता है अफजल की मां सबोधन का नैतिक अधिकार नहीं रखती और न ही अफजल की पत्नी, पत्नी होने का अधिकार रखती है जिसकी वजह से कितनों की मांग का सिन्दूर पुछ गया कितने बालक अनाथ हो गए। कितनों के सिर से साये उठ गये यह याल अफजल की मां और पत्नी को नहीं आता। हमारे यहां तो ऐसे कई उदाहरण है जब ऐसी प्रवृçत्त वालों को माताओं और पत्नी ने त्याग कर दिया।संसद भवन पर हमला करने की साजिश करने वालों को दण्ड न देकर देश क्या सन्देश देना चाहता है इस सम्बंध से पता नहीं है पर यह निश्चित है कि इस प्रकार की घटनाओं कोसोचने वालोंको कठोरतम दण्ड मिलना चाहिए। राष्ट्र सर्वोपरि है राष्ट्र के विरुद्ध आंख उठाकर देखने वालों को सार्वजनिक स्थान पर दण्डित किया जाना हमारी शçक्त संपन्नता सार्वभौमिकता स्वतन्त्रता का मापक हैं।
संपादकीय....क्या बन सकते हैं इतने राज्यलोकतन्त्र की सफलता इसी पर निर्भर है कि जितना सुदृढ़ पक्ष हो उतना ही दृढ़ विपक्ष हो, वह पूरी दृढ़ता के साथ अपनी बात रखे। परन्तु तेलंगाना का गाना बजते ही जो धूम धड़ाका हुआ वह लोकतन्त्र के लिए कहीं से कहीं तक ठीक प्रतीत नहीं होता है।इधर केन्द्र सरकार ने इस राज्य की मांग के पीछे की गम्भीरता को समझते हुए, आमरण अनिश्चितकालीन अनशन जैसे बापू के शçक्तशाली आज के सामने झुकते हुए घोषणा की और तेलंगाना अलग राज्य बनाए जाने को हरी झण्डी दी। इस घटना ने एक बात तो सिद्ध कर ही दी कि महात्मा गांधी के वह तरीके जिनके सामने ब्रिटेन की विश्व व्यापी सल्तनत को घुटने टेकना पड़े थे, वह तरीके आज भी औचित्यपूर्ण है। पर यह क्या केन्द्र द्वारा एक हरी झण्डी दिए जाते ही एक दम से कई सारी लाल झण्डियां सामने आ गईं, यहां तो न्यूटन जैसे महान वैज्ञानिक का गति का वहनियम ही फैल हो गया जिसमें उन्होंने कहा था कि हर क्रिया को ठीक बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। यहां क्रिया तो अभी बस शुरू ही हुई थी कि प्रतिक्रिया ने सबको अचभे में डाल दिया। आंध्र में तो मानो घमासान ही छिड़ गया। टप-टप कर इस्तीफों की बौछार होने लगी और देखते ही देखते मामला शतक को लांघ गया, बात विधायकों की ही नहीं है। सांसद भी मैदान में उतर पड़े। उन्होंने भी इस्तीफे सौंपना शुरू कर दिए। यही नहीं विरोध में तो स्वयं कांग्रेस के ही लोग उठ खड़े हुए नतीजा खुद कांग्रेस और केन्द्र ही सांसत में आ गए हैं और कांग्रेस की सुप्रीमो सोनिया गांधी को सबकी राय तैयार करने के प्रयास प्रारंभ करने पड़ गए।उधर एक दूसरी बात और चल निकली अमन में बोडोलैण्ड और महाराष्ट्र में विदर्भ और बुन्देलखण्ड जैसे अलग राज्यों की मांग भी उठने लगी। अब संकट यह है कि यह कि केन्द्र सरकार को यह कल्पना भी नहीं रही होगी कि ऐसा कुछ होगा, और सामने अनशन जैसा अकाट्य अ तो श्री राव ताने बैठे ही थे। अब केन्द्र की हालत तो तय है कि सांप छछून्दर सी हो गई है। मामला गले में फंसा ही समझो अब न तो बात उगलते बनेगी न ही मामला निकलते बनेगा। यह सही है कि विकेन्द्रीकरण के अपने लाभ होते हैं सत्ता की इकाई जितनी लघु होगी उतनी ही लाभकारी होगी। यह माना जाता रहा है। इसी सोच के साथ ही सम्भवतज् पंचायती राज को अपनाया गया पर इसके जो परिणाम सामने आए वह यह कि सत्ता के विकेन्द्रीकरण के साथ ही उन सब चीजों का भी विकेन्द्रीकरण हो जाता है जो कि सत्ता के साथ-साथ चलती है। मतलब यह कि भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार की दीमक के उतने ही बिन्दु हो जाते हैं उतने ही केन्द्र हो जाते हैं जितने सत्ता के, सो उतने ही मोचोZ पर निपटने की भी आवश्यकता पड़ती दिखाई देती है, माना यह रहा है कि जितनी इकाई छोटी होगी उतना ही नियन्त्रण बेहतर होगा।खैर इस सबके जो परिणाम सामने हैं जिस तरह से अलग राज्यों की मांग ने मुंह खोल दिया है उससे तो साफ लगता है कि राज्य यूं ही बनते गए तो स्थितियां निश्चय ही उतनी बेहतर नहीं होंगी जितनी कभी सोची गईं थी उल्टा मामला माइनस में जा सकता है। अब तो लगता है कि आवश्यकता एक बार फिर विचार की है हमें एक बार फिर सोचना होगा कि क्या किया जाए, क्या नहीं। साथ ही इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि इस तरह से अलग राज्यों की बढ़ती मांग के पीछे की मंशा क्या है, क्योंकि किसी भी क्रिया के ठीक होने, गलत होने या अपराध होने के भी केवल मंशा ही मूल होती है। यदि किसी का पेट कोई रोग ठीक करने के लिए काटा जाए तो वह ऑपरेशन हो जाता है और पेट काटने वाला शल्य चिकित्सक हो जाता है और यदि दूसरी तरफ देखें तो पता चलता है कि पेट किसी को जाने से मारने काटा जाए तो वह हत्या का प्रयास हो जाता है और उसका कर्ता अपराधी हो जाता है। अतज् मूल मंशा है यदि अलग राज्य की मांग के पीछे मंशा विकास है सुदृढ़ नियन्त्रण है तो ठीक यदि पद लोलुप्ता, मुयमन्त्री या मन्त्री की कुर्सी की चाह है या अलगाववाद के अंगारे उसे आंच दे रहे हैं तो तय है कि आज आवश्यकता एक बार फिर विचार की है क्या अलग राज्य की मांग ठीक है फिर वह बात तेलंगाना की हो बुन्देलखण्ड की हो या मामला विदर्भ का हो या पिर बात बोडोलैण्ड की हो। क्या हम इतने अलग राज्य बना सकते हैं या बनाना ठीक होंगे।
संपादकीय....क्या बन सकते हैं इतने राज्यलोकतन्त्र की सफलता इसी पर निर्भर है कि जितना सुदृढ़ पक्ष हो उतना ही दृढ़ विपक्ष हो, वह पूरी दृढ़ता के साथ अपनी बात रखे। परन्तु तेलंगाना का गाना बजते ही जो धूम धड़ाका हुआ वह लोकतन्त्र के लिए कहीं से कहीं तक ठीक प्रतीत नहीं होता है।इधर केन्द्र सरकार ने इस राज्य की मांग के पीछे की गम्भीरता को समझते हुए, आमरण अनिश्चितकालीन अनशन जैसे बापू के शçक्तशाली आज के सामने झुकते हुए घोषणा की और तेलंगाना अलग राज्य बनाए जाने को हरी झण्डी दी। इस घटना ने एक बात तो सिद्ध कर ही दी कि महात्मा गांधी के वह तरीके जिनके सामने ब्रिटेन की विश्व व्यापी सल्तनत को घुटने टेकना पड़े थे, वह तरीके आज भी औचित्यपूर्ण है। पर यह क्या केन्द्र द्वारा एक हरी झण्डी दिए जाते ही एक दम से कई सारी लाल झण्डियां सामने आ गईं, यहां तो न्यूटन जैसे महान वैज्ञानिक का गति का वहनियम ही फैल हो गया जिसमें उन्होंने कहा था कि हर क्रिया को ठीक बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। यहां क्रिया तो अभी बस शुरू ही हुई थी कि प्रतिक्रिया ने सबको अचभे में डाल दिया। आंध्र में तो मानो घमासान ही छिड़ गया। टप-टप कर इस्तीफों की बौछार होने लगी और देखते ही देखते मामला शतक को लांघ गया, बात विधायकों की ही नहीं है। सांसद भी मैदान में उतर पड़े। उन्होंने भी इस्तीफे सौंपना शुरू कर दिए। यही नहीं विरोध में तो स्वयं कांग्रेस के ही लोग उठ खड़े हुए नतीजा खुद कांग्रेस और केन्द्र ही सांसत में आ गए हैं और कांग्रेस की सुप्रीमो सोनिया गांधी को सबकी राय तैयार करने के प्रयास प्रारंभ करने पड़ गए।उधर एक दूसरी बात और चल निकली अमन में बोडोलैण्ड और महाराष्ट्र में विदर्भ और बुन्देलखण्ड जैसे अलग राज्यों की मांग भी उठने लगी। अब संकट यह है कि यह कि केन्द्र सरकार को यह कल्पना भी नहीं रही होगी कि ऐसा कुछ होगा, और सामने अनशन जैसा अकाट्य अ तो श्री राव ताने बैठे ही थे। अब केन्द्र की हालत तो तय है कि सांप छछून्दर सी हो गई है। मामला गले में फंसा ही समझो अब न तो बात उगलते बनेगी न ही मामला निकलते बनेगा। यह सही है कि विकेन्द्रीकरण के अपने लाभ होते हैं सत्ता की इकाई जितनी लघु होगी उतनी ही लाभकारी होगी। यह माना जाता रहा है। इसी सोच के साथ ही सम्भवतज् पंचायती राज को अपनाया गया पर इसके जो परिणाम सामने आए वह यह कि सत्ता के विकेन्द्रीकरण के साथ ही उन सब चीजों का भी विकेन्द्रीकरण हो जाता है जो कि सत्ता के साथ-साथ चलती है। मतलब यह कि भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार की दीमक के उतने ही बिन्दु हो जाते हैं उतने ही केन्द्र हो जाते हैं जितने सत्ता के, सो उतने ही मोचोZ पर निपटने की भी आवश्यकता पड़ती दिखाई देती है, माना यह रहा है कि जितनी इकाई छोटी होगी उतना ही नियन्त्रण बेहतर होगा।खैर इस सबके जो परिणाम सामने हैं जिस तरह से अलग राज्यों की मांग ने मुंह खोल दिया है उससे तो साफ लगता है कि राज्य यूं ही बनते गए तो स्थितियां निश्चय ही उतनी बेहतर नहीं होंगी जितनी कभी सोची गईं थी उल्टा मामला माइनस में जा सकता है। अब तो लगता है कि आवश्यकता एक बार फिर विचार की है हमें एक बार फिर सोचना होगा कि क्या किया जाए, क्या नहीं। साथ ही इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि इस तरह से अलग राज्यों की बढ़ती मांग के पीछे की मंशा क्या है, क्योंकि किसी भी क्रिया के ठीक होने, गलत होने या अपराध होने के भी केवल मंशा ही मूल होती है। यदि किसी का पेट कोई रोग ठीक करने के लिए काटा जाए तो वह ऑपरेशन हो जाता है और पेट काटने वाला शल्य चिकित्सक हो जाता है और यदि दूसरी तरफ देखें तो पता चलता है कि पेट किसी को जाने से मारने काटा जाए तो वह हत्या का प्रयास हो जाता है और उसका कर्ता अपराधी हो जाता है। अतज् मूल मंशा है यदि अलग राज्य की मांग के पीछे मंशा विकास है सुदृढ़ नियन्त्रण है तो ठीक यदि पद लोलुप्ता, मुयमन्त्री या मन्त्री की कुर्सी की चाह है या अलगाववाद के अंगारे उसे आंच दे रहे हैं तो तय है कि आज आवश्यकता एक बार फिर विचार की है क्या अलग राज्य की मांग ठीक है फिर वह बात तेलंगाना की हो बुन्देलखण्ड की हो या मामला विदर्भ का हो या पिर बात बोडोलैण्ड की हो। क्या हम इतने अलग राज्य बना सकते हैं या बनाना ठीक होंगे।
संपादकीययह कैसा अर्थशा?अर्थशा गूढ़ विषय है पर व्यçक्त के लिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। इस की चाल भी अजब है उसे आम तरीके से समझा नहीं जा सकता है मन्दी व्यापार में स्थिरता उत्पाद के मूल्य में गिरावट परिलक्षित करती है फिर भी महंगाई के कारण रोजमर्रा के उत्पाद के भाव क्यों बढ़ जाते हैं यह एक स्वाभाविक प्रश्न है जिस पर भारतीय जनता अपना सिर धुनती यदाकदा दिखलाई देने लग जाती है। वास्तव में जब विकास दर में बढ़ोतरी होगी उसस्थिति महंगाई बढ़ती है।आज हमारे देश में महंगाई चरम पर है। लोकसभा के चुनाव के बाद दैनिक उपयोगी वस्तुओं के दामों में बेइन्तिहा बढ़ोत्तरी हुई है। इस सम्बंध में अर्थशा की चाल कुछ भी हो पर राजनीतिशा तो यह कह रहा है कि महंगाई की मार से हर आम आदमी त्रस्त है।एक और महत्वपूर्ण प्रश्न लोकसभा और विधानसभा चुनावों के परिणाम देखने के पश्चात उभर कर सामने आ रहा है कि वास्तव में आदमी की क्रय शçक्त इतनी नहीं है कि वह सामान्य तरीके से अपना जीवन यापन कर सके वह विषमता में न तो मरने को है और न ही जीने के लिए। पर कांग्रेस को हर तरफ से जनता का समर्थन प्राप्त हो रहा है। विपक्ष कितना भी जोर लगाले यह सत्तापक्ष का बालबांका भी नहीं कर पा रहे हैं। हाहाकार है निदान नदारत है। खाद्यान्न की प्राçप्त है स्थितियां अनुकूल है फिर भी महंगाई बढ़ रही है, यह अर्थशा की शतरंजी चाल की करामात है या फिर राजनेताओं और व्यापारियों का चुनावी अर्थशा का परिणाम है। ऐसी परिस्थिति नहीं दिखलाई दे रही है जिसकी वजह महंगाई बढ़ रही हो और वर्तमान महंगाई की बढ़ोत्तरी को रोका नहीं जा सके। निश्चिततौर से व्यवस्था में उदासीनता भ्रष्टाचार जमाखोरी एवं राजनेताओं और व्यापारियों का गुप्त समझौता मूल कारणों की तरफ इशारा कर रहे हैं। महंगाई को रोकने जमाखोरों व वायदा बाजार पर कसाव करने के बजाय केन्द्रीय कृषिमन्त्री एवं प्रधानमन्त्री महंगाई बढ़ने को समर्थन देकर जमाखोरों और व्यापारियों को मदद में बयान दे रहे हैं। यह अर्थशा के कौन से उपखण्ड का शोध प्रबंध है या शोध विषय है कि अर्थशाी डा. मनमोहन सिंह जो देश के प्रधानमन्त्री की कुर्सी पर विराजमान हैं। वह महंगाई बढ़ोत्तरी के पक्ष में देशवासियों को कह रहे हैं। हम मानते हैं और समझते भी हैं कि संसद में एक भी ऐसा कर्मवीर कत्तüव्यनिष्ठ गरीबों की अनुभूति को अनुभव करने वाला व्यçक्त नहीं है जो महंगाई बढ़ने की घटना पर कुबाüनी के लिए तैयार होकर सरकार से दो-दो हाथ करने का साहस रखता हो एक भी सपूत सांसद नहीं है जो देश की आधारभूत मूल आवश्यकताओं की प्राçप्त को संवैधानिक अधिकार दिलवाये जाने के लिए अड़ जाता है। राजनीति का मतलब यह नहीं कि हम अपनी जिमेदारियों को वॉलीबाल बनाकर केन्द्र से राज् की तरफ उचकाते रहकर अपने-अपने स्वाथोZ की पूर्ति करते रहे।आर्थिक सुधारों की समर्थक केन्द्रीय सरकार महंगाई पर काबू नहीं पाने में विफलता का अर्थ यही है। अगर हम यह कहें कि महंगाई पर कोई भी जनप्रतिनिधि गम्भीर नहीं है तब अतिश्योçक्त नहीं होगी। हमारे यहां का तन्त्र इस कदर भ्रष्ट हो चुका है जिसकी कल्पना भी कभी नहीं की गई होगी। जन प्रतिनिधि कोई भी किसी भी पार्टी का या निदüलीय हो चुनाव में खड़ा ही नहीं हो सकता। हमारे यहां के जनप्रतिनिधि आम जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं होते वे उन लोगों के प्रति समर्पित और वफादार होते हैं जो उन्हें इस कुर्सी तक पहुंचाने में मदद करते हैं।आपको याद दिलाना अपना कत्तüव्य समझता हूं कि संसद महंगाई पर चर्चा के समय संसद कक्ष में लगभग 6भ् सांसद उपस्थित थे। जिस देश में सांसदों की यह स्थिति होगी। वहां समस्या का क्या कब और क्यों निदान होगा।केन्द्रीय सरकार राज्य सरकारों से महंगाई रोकने के लिए कहने लगे हैं और जमाखोरी के खिलाफ कार्यवाही को अंजाम देने की सलाह भेज रहे हैं। राज्य सरकारें कड़़े कदम उठाने से अपने को बचा रही है। दोनों ही संस्थाएं अपना-अपना वोट बैंक क्यों खराब करे। मसलन दोनों ही एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ रहे हैं। खाद्य पदाथोZ के थोक मूल्यों पर आधारित मुद्रास्फीति की दर 1भ्.भ्8 प्रतिशत तक पहुंच गई है। खाद्यान्न के भाव दो गुणे हो चुके हैं। खाद्यान्न आदि की उपलब्धता आसान नहीं है। जन वितरण प्रणाली दोष युक्त है। सुधार जनोपयोगी कार्यक्रम चुनाव के चौथे वर्ष से शुरू होते हैं तब तक जनता का शोषण करने का राजनीतिज्ञों का चिरपरिचित कार्यक्रम अबाध गति से चलता रहता है। भारतीय राजनीतिज्ञों का अर्थशा समझने के लिए हम भारतीयों को एक नहीं कई जन्म लेने पड़ेंगे। क्योंकि जब एक विद्वान अर्थशा के हाथ में पूरी बागडोर हो और वहर बोले कि महंगाई की मार झेलनी ही पड़ेगी। इसमें कुछ नहीं किया जा सकता है।
संपादकीय...चिन्ता, चिन्तन, चर्चा ही नहीं काफीदेर आए दुरुस्त आए, यह कहावत भले ही सच है पर देर की एक सीमा भी तो होती है।यदि उस सीमा से ज्यादा देर हो जाए तो उसके बाद कोई प्रयास, कोई भी उपचार काम नहीं करता है। तब केवल एक कहावत याद ाती है कि- अब पछताए क्या होत है जब चिçड़या चुग गई खेत। आज हम जलवायु को लेकर चिन्तित है, यह चिन्ता हमारी नहीं पूरी दुनिया की, हर पृथ्वीवासी की चिन्ता हो गई है। यहां यह कहकर आत्मसन्तोष की अनुभूति की जा सकती है कि जब जागे तभी सवेराहै। चलो सन्तोष कर लेने में बुराई भी कुछ खास नहीं। डेनमार्क की राजधानी कोपेन हेगन में जलवायु समेलन चल रहा है सारी दुनिया की नज़रें इस तथाकथित समुद्र मन्थन पर टिकी है। इस समुद्र मन्थन से किसको क्या मिलेगा, कितना अमृत निकलेगा, कितना गरल यह तो काल के गर्भ में छिपी स\"ााई है जो सामने आ ही जाएगी। आज इस समेलन के सुर्खियों में सजकर जोसमाचार सामने आ रहे हैं वह हम सबके सामने हैं। विकसित देशों की अपनी ढपली है, विकासशील देशों का अपना राग है, अविकसित देशों की अपनी पीढ़ा है, उन्हें तो अपने अस्तित्व पर ही संकट दिखाई पड़ रहा है।आज इस समेलन के मूल में जो मुय बिन्दु हमारे सामने है वह ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन। अब इन्हीं में से एक है काबüनडाइआक्साइड जो लगबग हर जीव श्वसन के दौरान तो उत्सर्जित करता ही है, परन्तु आज तमाम यान्त्रिक, एवं विज्ञान जनित गतिविधियों में इस गैस सहित अन्य छह ग्रीन हाउस प्रभाव रखने वाली का उत्सर्जन अधिक होने से मामला इतना अधिक गड़बड़ा गया है कि पूरी दुनिया को चिन्ता हो गई है। आज कोपेनहेगन में पूरी दुनिया के लोग जलवायु परिवर्तन पर चिन्ता, चिन्तन और चर्चा में जुटे हैं। हर देश की अपनी बात है, अपनी चिन्ता है, अपनी मजबूरी है। सबकी चाहत अमृत की है सो पूरी तब नहीं हुई जब समुद्र मन्थन हुआ था, आज तो बात ही अलग है, आज इस मन्थन से दायित्वों, जिमेदारियों, कत्तüव्यों का, कटौतियों का जो गरल निकलने की उमीद है वह पीने को कोई तैयार दिखाई नहीं देता है। हां, इसमें भारत का प्रयास प्रशंसनीय है कि उसने स्वयं ही 2भ् प्रतिशत कटौती की बात हटा रखी है। सही है भारत ही एक ऐसा देश है जहां प्रकृति की पूजा का प्रावधान है, भारत को पर्यावरण की महत्ता पूर्व से ही पता है यह उसे बताए जाने की आवश्यकता नहीं। हां याद जरुर करानी पड़ेगी। इस जलवायु समेलन के क्या ठोस परिणाम निकलेंगे, विकसित, विकासशील और अविकसित देशों के बीच क्या कोई बात बन पाती है। यह संभावना तभी प्रबल हो सकेगी जबकि चिन्ता, चिन्तन और चर्चा के अलावा भी कुछ हो अथाüत निष्कषोZ पर कुछ ठोस कदम उठे, जलवायु परिवर्तन जो नकारात्मक दिशा में मुड़ गए हैं वह वापस अपना सधा स्वरूप प्राप्त कर सकें। तब बात बने, अब केवल चिन्ता, चिन्तन और चर्चा से ही बात बनती नहीं दिखती है। अब आवश्यकता है ठोस कदमों की, नहीं तो फिर देर हो जाएगी, कल क्या होगा वह भी हमें ही अथाüत् धरती वासियों को ही भोगना होगा।
संपादकीयकिस करवट बैठेगा ऊंटशेख हसीना के बंगला देश में सत्ता में आने के पश्चात भारत-बंगलादेश सम्बंध सामान्य होते चले आ रहे हैं तथा दोनों ही देश एक दूसरे के सजायाता कैदियों के प्रत्यर्पण पर संधि भी करने के नजदीक हैं। इस बात की पुष्टि ऐसे हो रही है कि यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आफ असम (उल्फा) के अद्यक्ष भ्3 वर्षीय अरविन्द राजखोवा उनकी पत्नी व अन्य उग्रवादी और उल्फा उपप्रमुख 43 वर्षीय राज बरुआ आदिकी बंगलादेश में गिरतारी कर मेघालय में भारतीय सीमा सुरक्षाबल का सुपुदü करना भारत-बंगला देश के सम्बंधों में मजबूती की दिशा में एक अहम पड़ाव है। अन्य उल्फा नेताओं की गिरतारी हो रही है। इन सब कारणों का यदि हम विश्लेषण करें। तब निश्चित तौर हम सोच सकते हैं कि अरविन्द राजखोवा शान्ति वार्ता के लिए तैयार है। जबकि परेश बरुआ संप्रभुता के अलावा किसी और मुद्दे पर बातचीत नहीं करना चाहते, बातचीत की मध्यस्थता करने वाली इन्दिरा गोस्वामी का विचार है कि असम में स्थायी शान्ति के लिए उल्फा कमाण्डेन्ट परेश बरुआ को बातचीत की प्रक्रिया में शामिल किया जाए।
असम की संप्रभुता के मुद्दे पर 1979 में उल्फा का गठन जनता के हितों की रक्षा के मद्देनज़र किया गया था। इस संगठन को असम की जनता का भारी समर्थन हासिल था क्योंकि भेदभाव का शिकार असम के गांवों में रहने वाले इस संगठन की शçक्त थे मगर जैसा आम तरीका होता है कि जिस उद्देश्य को लेकर कोई संगठन खग होता है वह कुछ समय बाद स्वाथोZ एवं अहमवादिता से ग्रसित हो जाता है और वह अपने लक्ष्य से भटककर हिंसाके रास्ते पर चलना शुरू कर देता है बस वहीं से जनता के हितों की जगह आतंकवादी अलगाववादियों की गिरत में पहुंच जाता है। ऐसा ही कुछ हुआ जिसकी बजट से यूनाइटेड लिबरेशन फंट आफ असम (उल्फा) असम की ग्रामीण जनता का ही अहितैषी होकर आईएसआई आदि उग्रवादियों की गोद में जा बैठा, और हिंसा का रास्ता अतयार कर असम में आतंकवाद बम धमाके, निदोüषों की हत्यायें करने लगे हैं।यह सच है कि बन्दला देश बनने के बाद वहां पर राजनीतिक अस्थिरता का वातावरण बना और कट्टरपन्थियों के हाथों में खेलकर उल्फाजैसे भारतीय आतंकवादीसंगठनों की पनाहगाह जगह बन गया। इतना ही नहीं कश्मीर घाटी के माध्यम भारत में आतंकी पैदा करने के लिए पाक की आईएसआई को समान सोच वाले संगठनों से बातचीत कर एक वृहद इस्लामी राष्ट्र बनाने के लिए असम में पूर्ण अस्थिरता पैदा करने का षडयन्त्र रचा गया और बंगलादेश से भारी मात्रा में घुसपैठ करवाई गई। हमारे देश के सत्तारूढ़ दलों ने सस्ती लोकप्रियता और चुनावी लाभ के लिए बंगलादेशी घुसपैठ के मूकदर्शक बने रहे। उल्फा वृहद इस्लामी राष्ट्र बनाने के इरादे से असम पर हमला कर उसे बन्दलादेश से मिलानेकी ताक में बैठी ताकतों के हाथों बिक गया। उल्फा के नेतागण बंगलादेश से अपने संगठन का संचालन करने लगे इन्हें आईएसआई और हूजी जैसे संगठनों से सहायता, प्रशिक्षण और हथियार बारूद आदि की सहायता आसानी से उपलब्द होने लगी।पिछले तीन दशक से जारी यह खेल आखिर कब तक खेला जाता रहेगा इसका अन्त होने का समय आ गया है। इस पार या उस पार। भारत सरकार इसी मामले में 1992 में एक बार धोखा खा चुकी है। अब की बार सरकार को बहुत सोच समझकर फूंक-फूंक कर कदम उठाने पड़ेंगे। गृहमन्त्रालय शान्ति वार्ता शुरू करने के पहले सुनिश्चित कर ले कि उल्फा प्रमुख अरविन्द राजखोवा को सार्वजनिक तौर पर संप्रभुता की मांग को छोड़ने की घोषणा करनी ही चाहिए।प्रतिबंधित संगठन यूनाइटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के संस्थापक एवं अध्यक्ष अरविन्द राजखोवा, उसके निजी सुरक्षाकर्मी राजा बोरा और उप प्रमुख राजू बरुआ को अदालत में पेश किया गया। राजघोवा ने फिलहाल कहा है कि उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया उन्हें गिरतार किया गया है। दूसरी तरफ उल्फा के कमाण्डर इन चीफ परेश बरुआ राजखोवा की गिरतारी की खबर का खण्डन किया है। कुल मिलाकर सरकार को बदलते हुए घटनाक्रम पर पैनी नज़र रखने की जरूरत है साथ अभी 12 दिनों तक न्यायिक हिरासत के समय ऊंट किस करवट बैठता है। इस पर विचार किये जाने की जरूरत है। असम सरकार इस दौरान आतंकवादियों पर अपना पूरा कसाव रखकर सत कार्यवाही का दबाव बनाकर मुयधारा से जोड़ने का माहौल बनाए।
संपादकीयसबसे सुदृढ़ भारतीय अर्थव्यवस्थासपूर्ण विश्व मन्दी की मार से परेशान है जहां देखो मन्दी के कारण उद्योग धंधों से लेकर नौकरियों का टोटा पड़ता चला जा रहा है। नौजवानों को रोजगार मुहैय्या नहीं हो पा रहे हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों में भारत व चीन की अर्थव्यवस्था थोड़े से झंझावातों को झेलकर पुनज् प्रगति के पथ पर अग्रसर है। आज इस बात को कहने में हमको गर्व हो सकता है कि चीन की आर्थिक स्थिति से भी सुदृढ़ता भारतीय अर्थव्यवस्था में है हम वित्तवर्ष की दूसरी तिमाही में शानदार बढ़त पर खड़े हैं। पिछले वर्ष की ठीक इसी तिमाही के मुकाबले इस बार 7.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। जो अर्थशाçयों के अनुमान से कहीं बेहतर है। हम मान रहे ते कि सूखे से बबाüद हुई खेती की उपज इस बार पिछले साल की तुलना में कहीं कम होगी, मगर इस मोर्चे पर भी स्थिति ज्यादा खराब नहीं है।इलेक्ट्रोनिक क्षेत्र के अलावा कार फि्रज जैसे स्थायी महत्व के उपभोक्ता सामानों में तो यह 23 प्रतिशत की ऐतिहासिक ऊंचाई तक पहुंच गई है। इन आंकड़ों से ज्यादा लब-चौड़े परिणाम न निकालें तब भी उस हताशा से अब हम उबर चुके हैं जो हर तीसरे चौथे दिन दुनिया के किसी भी कोने से उछलकर हमारे शेयर बाजारों का गला पकड़ लेती है। दुबई रीयल एस्टेट कंपनियों का दिवालिया होना, भारतीय बैंकों का 6भ्00 करोड़ रुपया दुबई में लगा हुआ है उस पर भी प्रभाव का पड़ना उससे बैंकों को नुकसान होने की पूरी संभावना दिखाई दे रही है। दुबई की वर्तमान स्थिति इसलिए ऐसी हुई है कि दुबई सरकार ने रीयल एस्टेट पर ही अधिक ध्यान दिया और सरकारी कपनी दुबई वल्र्ड ने विदेशी वित्तीय संस्थानों से अंधाधुन्ध कर्ज लेकर भव्य इमारतें खड़ी कर दीं। होटल शापिंग मॉल बना दिए गए। वैश्विक वित्तीय संकट से दुबई भी अछूता नहीं रहा। खरीददार का टोटा पड़ गया जिससे भारतीय बैंकों और विल्डरों, फिल्म स्टारों ने अपना धन तो वहां लगा दिया अब उनका पैसा फंसने की आशंका से दहशत फैल गई है। ब्लैक मनी तो ब्लैक ही हो जाएगी। दुनियाभर की सरकारें अमेरिका ब्रिटेन और भारत तक के शेयर बाजार और रिजर्व बैंक आफ इण्डिया दुबई से जुड़ी कपनियों के जौखिम का हिसाब लगाने में लगी हुई है। आइसलैण्ड में बैंक डूब जाना, अमेरिका में अरबपति की पोल खुल जाना विश्व अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण खबर हो सकती है। मगर हमारे देश भारत जैसे उभरते बाजार के लिए ऐसी खबरें महत्व नहीं रखती क्योंकि हमारे यहां विकास की गति बहुत अधिक बेहतर है। अगर हम यह कहें कि हमारी अर्थव्यवस्था चीन से कहीं अधिक सुद़ढ़ और सशक्त है तब अतिश्योçक्त नहीं होगी। इसी तारतय में यह बतलाना आवश्यक होगा कि वित्तवर्ष की दूसरी तिमाही में चीन की वृद्धि पर 9.6 प्रतिशत दर्ज की गई थी मगर इसमें बड़ा हिस्सा निर्यात आधारित उद्योग का है, जिनका उत्पादन बढ़ने का कोई मतलब तभी है जब ठहरे हुए बाहरी बाजारों में उनका सामान निकल जाए। चीन की तुलना में विदेशी बाजारों पर भारत की निर्भरता आज भी बहुत कम है। बना हुआ माल वापस आने या गोदामों में पड़े-पड़े सड़ जाने का यहां कोई मामला ही नहीं बनता। यानी बीती तिमाही में चीन की वृद्धि दर भले ही भारत से ज्यादा हो मगर आर्थिक स्थिति के स्वास्थ्य की दृष्टि से भारतीय अर्थव्यवस्था का हाल उससे अच्छा समझा जाएगा।मन्दी से लड़ने के लिए सरकार ने जो करों में छूट और निर्यात सçब्सडी जैसे कदम उठाए थे, क्या उन्हें वापस लेने का समय आ गया है। खाद्य वस्तुओं की महंगाई पहले ही असहनीय है बिक्री के आंकड़ों से उत्साहित होकर अब उद्योगों ने भी अपने सामानों की कीमतें बढ़ानी शुरू कर दी हैं तब मुद्रास्फीति बेकाबू हो सकती है इसके लिए क्या ब्याज करें बढ़ाकर कीमतों पर अंकुश लगाने की शुरुआत कर दी जानी चाहिए? इन दोनों ही सवालों के जवाब भविष्य के गर्भ में समाहित है है। मन्दी से लड़ने का प्रश्न के जवाब अगले बजट तक ना में दिया जा सकता है। मगर ब्याज तरें बढ़ाकर कीमतों पर अंकुश लगाने के सम्बंध में जवाब खोजने के लिए अब और इन्तजार नहीं किया जा सकता अच्छी वृद्धि दर का लाभ आम आदमी तक पहुंचाने के लिए मुद्रास्फीति पर तो कमर कसनी ही होगी।

sampadkiya

संपादकीयसुरक्षा में दया ठीक नहींबहुत कुछ खोने के बाद जागने की परंपरा का निर्वहन हमारी सरकारें कब तक करतीं रहेंगी। पिछले 62 वषोZ से हमने बहुत कुछ खोया है और आज भी खोते चले आ रहे हैं कब तक यह क्रम चलता रहेगा, निरीह, बेकसूर की नियति ही मरने की है। प्रश्न उठता है कि क्या सरकार की नाम की कोई संस्था देश में है उसके क्या-क्या कत्तüव्य है? मात्र मरने वालों के परिजनों को एवज में कुछ रुपए दे देने से सरकार और राज्य का कत्तüव्य पूरा हो जाता है। सरकार की वर्तमान सोच किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराई जा सकती जिस राज्य में आम जनता को सुरक्षा नहीं उपलब्ध हो पाए वह राज्य कभी भी पनप नहीं पायेगा। राज्य व सरकार का आधारभूत कत्तüव्य है कि वह अपने नागरिकों को पूर्ण सुरक्षा उपलब्ध करवाए और अपने राज्य में कानून राज कायम करे। इसके लिए आन्तरिक और बाहरी शत्रु में भेद नहीं किया जा सकता। जिस सरकार ने बाहरी और आन्तरिक शत्रुओं ने भेद किया वहां कभी भी कानून का राज्य स्थापित नहीं हो सकता। शत्रु तो शत्रु होता है शत्रु के साथ सहानुभूति आत्मघाती होती है। शायद यही कारण है कि हमारे यहां आन्तरिक शत्रुओं के हौंसले बुलन्द है। इसी प्रकार अपराध छोटा और बड़ा नहीं होता है। आज जो छोटा (माइनर) अपराध है वहीं कल बड़ा अपराध करने के लिए प्रोत्साहित हो सकता है इसलिए अपराधी की मनोवृçत्त को संरक्षित नहीं किया जाना चाहिए छोटे से अपराध के लिए कठोरतम दण्ड का प्रावधान जरूरी है। इतिहास साक्षी है जिन देशों में कठोर दण्ड प्रक्रिया लागू है वहां पर अपराध का रेशो बहुत कम है कई ऐसे राष्ट्र हैं जहां पर चोरी नहीं होती है उन लोगों ने ऐसी व्यवस्था स्थापित कर रखी है कि वहां रहने वाले अपराध करने की हिमत ही नहीं कर पाते। हम ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं कर पा रहे हैं। निश्चिततौर से हमारे अन्दर कुछ कमियां हैं। उन्हीं कमियों का फायदा आपराधिक तत्व उठाते आ रहे हैं।देश-प्रदेश में आतंकवादियों की हरकतें बढ़ रही हैं। आपराधिक घटनाओं में वृद्धि, नक्सलवादी स्कूल भवन और रेलपटरियों को विस्फोटों से उड़ा रहे हैं। सड़क यातायात बाधित कर रहे हैं। अलगाववादी शçक्तयां सिर उठाने लगी हैं हमारे अड़ोसी-पड़ोसी देश को तोड़ने सरहदों पर हरकतें करने लगे हैं। सीमा पर बंकरे खुदने लगी हैं सेनाओं का जमावड़ा होने के लिए दो पड़ोसी तैयार बैठे हैं। चीन और पाकिस्तान दो तरफा हमले की तैयारी में है। ऐसी स्थिति में हम आन्तरिक और बाहरी दोनों ही शत्रुओं से घिरे हुए हैं। ऐसी विषम परिस्थिति में सरकार और प्रशासन का वर्तमान रवैया अक्षय है। हमको बाहरी और आन्तरिक दोनों ही मोचोZ पर डटकर मुकाबला करने के तैयार रहने की जरूरत है। अपराध छोटा हो या बड़ा दण्ड का प्रावधान किया जाना आवश्यक है।कुछ खोकर जागने की प्रवृçत्त से हमको बाहर निकलना ही पड़ेगा। हमको नये सिरे से देश के निर्माण के लिए आधारभूत कार्यक्रम बनाना पड़ेगा। सरकार चाहे वह सप्रंग की हो या अन्य किसी की हम सबको मिलकर इस दिशा में विचार करने और उसको अमल करने का समय आ गया है। जब तक हम राष्ट्र की शçक्त की विश्व को बानगी नहीं देगें। पड़ोसी हमसे çढढोली करते रहेंगे। इसलिए आवश्यक है कि हमको मिल बैठकर पड़ोसियों को सबक सिखलाना ही पड़ेगा। इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है।अतिरिक्त सुरक्षा के क्षेत्र में किसी प्रकार का दयाभाव सरकार को नहीं बरतना चाहिए। नक्सलवादियों से निपटने के लिए एक साथ कार्यवाही की जानी ही श्रेष्ठ कर है चाहेकोई भी प्रदेश हो सबमें एक साथ कार्यवाही हो। निकट भविष्य में नक्स्लवादियों को नेस्तनाबूद करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। इसका हमारे पड़ोसियों पर असर पड़ेगा।