Thursday, February 18, 2010
संपादकीयनियन्त्रित हो सकते हैं भाववित्तमन्त्री प्रणब मुखर्जी ने देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाए रखने और आर्थिक विकास दर को 8 प्रतिशत के मुहाने को लेने की जो आशा की थी उस तक पहुंचने में कामयाब हो गए हैं। उनकी सोची समझी आर्थिक रणनीति का ही परिणाम है कि भारत अपनी अर्थव्यवस्था को विश्व मन्दी के झंझावतो को झेलकर अडिग ही नहीं खड़ा है बल्कि प्रगति पथ पर अग्रसर है।वितमन्त्री प्रणब दा का आत्मविश्वास और द्वारा ही यह सब सम्भव हो सका है कारपोरेट क्षेत्र ने अपना कारोबार उत्पादन बढ़ाकर एवं घरेलू मांग के अनुरूप दुनिया में चल रही मन्दी को बेअसर कर दिया है।घरेलू मांग को बढ़ाने के लिए वित्तमन्त्री ने कार्पोरेट क्षेत्र से अपेक्षा की थी कि वह अपने मुनाफे में कटौती करके अपने-अपने उद्योगों से कर्मचारियों की छंटनी से परहेज कर उत्पादन को बढ़ाकर बाजार की मांग को पूरा करने का प्रयत्न करें तथा सरकार द्वारा दी जा रही रियायतों का उपयोग करें। तत्कालीन वित्तमन्त्री पी चिदबरम ने रिजर्व बैंक के द्वारा रोकड़ बढ़वाकर बैकिंग उद्योग को मन्दी की बयार से बचाकर रखा जिसकी वजह से सभी बैंक मजबूती के साथ अपना-अपना कार्य करा रहे हैं।दुनियां के देश भारत की इस कामयाबी से चकित ही नहीं अचंभित हैं कि विषमता में स्थिरता का मूलमन्त्र भारत की सरकार और जनता के पास है। भारतीय जनता ने बिना डगमगाए वैश्विक मन्दी से डटकर मुकाबला कर एक मिसाल कायम की है। असल में इस सम्बंध में जब बात ही चली है तब हम पूर्व प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी की दूरदर्शिता कि, उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके हमको बहुत बढ़ी ताकत दी थी। आज राष्ट्रीयकरण के कारण ही हम मन्दी की विश्व व्यापी बीमारी का मुकाबला करपाए हैं।विचार करने की बात है कि अमेरिका जैसे शçक्त सपन्न राष्ट्र भी विश्वव्यापी मन्दी से प्रभावित हुए बिना नहीं है वहीं पर हमारी मुद्रा रुपए की कीमत में जबरदस्त गिरावट को रोकना मुश्किल हो जाता।यह सही है कि हम खाद्य मोर्चे पर जनता की परेशानियों को कम नहीं कर पा रहे हैं। इसका मूल कारण उत्पादन की कमी है मांग ज्यादा है फिर भी एक बाद निश्चित है कि सब्जी आदि के भाव निश्चित रूप से कम होंगे जैसे-जैसे बाजार में उत्पादन आने लगेगा भाव नियन्त्रित होने लगेंगे।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment