Thursday, February 18, 2010
संपादकीयमतदान की अनिवार्यता?गुजरात विधानसभा के शीतकालीन सत्र के अन्तिम दिन स्थानीय निकाय कानून संशोधन विधेयक 2009 को मंजूरी देकर देश में पहली बार मतदान को अनिवार्य करने और मतदाताओं को नकारात्मक वोटिंग का अधिकार कर देश को एक दिशा दी है।भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में गुजरात विधानसभा ने अनूठा और साहसिक कदम उठाकर यह सन्देश दिया है कि लोकतन्त्र को पुष्ट करने, उसे कारगर बनाने और भारतीय जनता को महत्व देने का चिन्तन गुजरात के राजनेताओं में है। वह केवल स्वार्थ और वोट की राजनीति तक ही सीमित नहीं है। मताधिकार की अनिवार्यता और नकारात्मक मतदान दोनों ही ऐसे श हैं जिनसे आजके राजनेताओं की जमीन सरकने लगेगी। आज नेता कैसे बनता है और उसका बजूद क्या है इससे हर कोई जानकार है पर जब मतदान अनिवार्य करदिया जाएगा उस समय मतदाता को मत देना जरूरी हो जाएगा। अन्यथा डिफाल्टर घोषित हो जाएगा। डिफाल्टर मतदाता कोकुछ अधिकारों से वंचित होना पड़ सकता है। शनैज्-शनैज् मताधिकार के सम्बंध में जागरूकता बढ़ेगी। शिक्षा के विकासके साथ मताधिकार का उपयोग निश्चित तौर पर एक क्रान्ति ला देगा। गुजरात राज्य ने देश की सकारात्मक और लोकतन्त्र को मजबूत करने में अपनी ्हम भूमिका का निर्वहन करके यह बतला दिया है कि गुजरात गांधी का प्रदेश है।हम समझते हैं कि गुजरात की देखा देखी अन्य राज्य भी अनुशरण करेंगे और देर सवेर विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में भी यह लागू हो जाएगा।इस प्रश्न पर राष्ट्रीय राजनैतिक दलों को राष्ट्रीय परिपेक्ष में विचार करने की जरूरत है। आज की राजनैतिक अस्थिरता को समाप्त करने का इससे अच्छा और कोई मार्ग नहीं हो सकता।सभी राजनैतिक दल समर्पित प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारेंगे। अवसर वादिता पर अंकुश लगेगा। कुल मिलाकर इसका दूरगामी असर पड़ेगा।
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